छत्तीसगढ़ में ईंधन बचत की अपील बेअसर, वीआईपी काफिलों में वाहनों की लंबी कतार
छत्तीसगढ़ में पेट्रोल-डीजल बचाने की अपील का असर जमीनी स्तर पर कमजोर दिख रहा है। जहां आम लोगों से ईंधन बचत की बात कही जा रही है, वहीं मुख्यमंत्री और मंत्रियों के काफिलों में बड़ी संख्या में वाहन शामिल होने से सवाल उठ रहे हैं।

रायपुर/एजेंसी। देशभर में पेट्रोल-डीजल की बढ़ती खपत को नियंत्रित करने और ऊर्जा संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए प्रधानमंत्री द्वारा की गई अपील का असर छत्तीसगढ़ में नगण्य दिखाई दे रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जहां देशभर में पेट्रोल-डीजल बचाने और संसाधनों के संयमित उपयोग की अपील कर रहे हैं ,वहीं दूसरी ओर प्रदेश के मुख्यमंत्री और मंत्रियों के काफिलों में बड़ी संख्या में वाहनों की मौजूदगी इस अपील के विपरीत तस्वीर पेश कर रही है।
हाल ही में विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों और दौरों के दौरान मुख्यमंत्री एवं मंत्रिमंडल के सदस्यों के काफिलों में दर्जनों वाहनों की लंबी कतारें देखी गईं। इन काफिलों में सुरक्षा, प्रशासनिक अधिकारियों और अन्य सहयोगी स्टाफ के वाहनों के अलावा कई अतिरिक्त गाड़ियां भी शामिल रही, जिससे ईंधन की खपत को लेकर सवाल उठने लगे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार के काफिलों से न केवल ईंधन की खपत बढ़ती है, बल्कि पर्यावरण पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
राज्य में आम जनता पहले ही महंगे पेट्रोल-डीजल की मार झेल रही है। ऐसे में सरकार के उच्च पदों पर बैठे लोगों द्वारा ईंधन बचत के संदेश का पालन न करना लोगों के बीच असंतोष का कारण बन रहा है। कई सामाजिक संगठनों और नागरिकों ने इस पर चिंता जताते हुए कहा है कि यदि सरकार स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करे, तभी आम जनता पर उसका सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे को लेकर राज्य सरकार पर निशाना साधा है। उनका कहना है कि एक ओर प्रधानमंत्री देशवासियों से ईंधन बचाने की अपील कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर राज्य सरकार के प्रतिनिधि ही इस दिशा में गंभीर नजर नहीं आ रहे हैं। उन्होंने काफिलों में वाहनों की संख्या सीमित करने और अनावश्यक खर्चों पर रोक लगाने की मांग की है।
प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार सुरक्षा कारणों से काफिलों में वाहनों की संख्या निर्धारित की जाती है, लेकिन कई बार प्रोटोकॉल से अधिक वाहनों के शामिल होने की शिकायतें भी सामने आती रही हैं। इसको लेकर समय-समय पर दिशा-निर्देश जारी किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इनका पालन पूरी तरह से नहीं हो पाता।
ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सरकारी स्तर पर ही ईंधन बचत के ठोस कदम उठाए जाएं, जैसे कि काफिलों का आकार सीमित करना, साझा परिवहन का उपयोग बढ़ाना और अनावश्यक वाहनों को कम करना, तो इससे न केवल ईंधन की बचत होगी बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान मिलेगा।
कुल मिलाकर छत्तीसगढ़ में वर्तमान स्थिति यह संकेत देती है कि पेट्रोल-डीजल बचत को लेकर किए जा रहे आह्वान और जमीनी हकीकत के बीच स्पष्ट अंतर है। अब देखना यह होगा कि सरकार इस दिशा में क्या कदम उठाती है और क्या आने वाले समय में उच्च पदस्थ अधिकारियों के काफिलों में वाहनों की संख्या कम कर एक सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत किया जाता है।




