शिक्षा के नाम पर कालाबाज़ारी, अभिभावक मजबूर
किताबों और कॉपियों के नाम पर अभिभावकों की जेब पर भारी बोझ, स्कूल प्रबंधन की मनमानी पर उठे सवाल

राजीव कुमार गौड़/दिल्ली ब्यूरो। भारत में निजी स्कूलों द्वारा शिक्षा के नाम पर ‘कालाबाजारी’ और ‘कमीशनखोरी’ का मुद्दा तेजी से बढ़ रहा है, जिससे अभिभावक अत्यधिक मजबूर और ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। हालिया रिपोर्ट्स और वीडियो के अनुसार, निजी स्कूल हर साल किताबों, यूनिफॉर्म और री-एडमिशन के नाम पर अभिभावकों से मोटी रकम वसूल रहे हैं। दिल्ली में नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत से पहले अभिभावकों पर किताबों और कॉपियों के नाम पर अतिरिक्त बोझ डालने की शिकायतें सामने आ रही हैं। कई निजी स्कूल प्रबंधन किताब-कॉपी की बिक्री को लेकर अभिभावकों से सीधे नकद राशि वसूल रहे हैं। पहली से तीसरी कक्षा तक के छात्रों के लिए 5500 से 7500 रुपये तक की राशि ली जा रही है, जिसे अभिभावक शिक्षा के नाम पर खुली लूट बता रहे हैं।
यह स्थिति शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करती है। स्कूलों का दायित्व बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना है, लेकिन जब किताबों और कॉपियों के नाम पर अभिभावकों को मजबूर किया जाता है, तो यह शिक्षा को व्यवसायिक लाभ का साधन बना देता है। नकद भुगतान की अनिवार्यता भी संदेह पैदा करती है कि कहीं यह कालाबाज़ारी का हिस्सा तो नहीं।
अभिभावकों का कहना है कि वे अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए हर संभव प्रयास करते हैं, लेकिन स्कूल प्रबंधन की मनमानी उन्हें आर्थिक रूप से कमजोर कर रही है। शिक्षा का उद्देश्य समाज को सशक्त बनाना है, न कि अभिभावकों को लूट का शिकार बनाना।
सरकार और शिक्षा विभाग को इस मुद्दे पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए। यदि समय रहते इस पर रोक नहीं लगाई गई तो यह प्रवृत्ति और बढ़ेगी और अभिभावकों का विश्वास शिक्षा व्यवस्था से उठ जाएगा। आवश्यक है कि स्कूलों को किताबों और कॉपियों की बिक्री में पारदर्शिता बरतने के लिए बाध्य किया जाए और अभिभावकों को विकल्प दिया जाए कि वे किताबें और कॉपियां खुले बाजार से भी खरीद सकें। शिक्षा को व्यवसायिक लाभ का साधन बनने से रोकना ही इस समय सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। दिल्ली सरकार से अपेक्षा है कि वह इस कालाबाज़ारी पर अंकुश लगाए और अभिभावकों को राहत दिलाए।




