मदन मोहन मालवीय टेक्नोलॉजी यूनिवर्सिटी के छात्रों ने बनाया बायोडिग्रेडेबल ड्रोन

गोरखपुर,(उत्तर प्रदेश)। आपने कभी ऐसा ड्रोन देखा है, जो गिरकर टूट जाए तो वह कबाड़ की जगह मिट्‌टी बन जाए। अगर नहीं देखा तो मदन मोहन मालवीय टेक्नोलॉजी यूनिवर्सिटी के छात्रों के इस करिश्मे को देखिए और उस पर गर्व करिए। छात्रों ने एक ऐसा ड्रोन तैयार किया है, जो धरती पर प्लास्टिक और जमीन की उर्वरा को नुकसान पहुंचाने वाले कबाड़ का बोझ बढ़ाने की जगह मिट्टी के साथ घुल-मिल जाएंगे। एमएमएमयूटी के छात्रों की इस खोज की हर तरफ चर्चा है। एमएमयूटी के छात्रों ने 750 ग्राम वजन के ड्रोन को तैयार करने में सफलता हासिल की है। यह ड्रोन पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाला नहीं है। इंडियन मोबाइल कांग्रेस में जब इस ड्रोन को पेश किया गया तो सबने इसकी खूब तारीफ की। दरअल, एमएमएयूटी के छात्रों ने ड्रोन को ऐसे मटेरियल से तैयार किया है, जो प्रकृति को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। बायोडिग्रेडेबल मटेरियल पॉली लैक्टिक एसिड को पर्यावरण के लिए सुरक्षित माना जाता है, ड्रोन को छात्रों ने इसी मटेरियल से तैयार किया है। इस ड्रोन की सबसे बड़ी खासियत है कि खराब होने के छह माह बाद यह मिट्‌टी में बदल जाएगा।
फाइबर से प्रकृति को नुकसान
परंपरागत ड्रोन कार्बन फाइबर के बने होते हैं। इन्हें आप मिट्‌टी में 50 साल भी दबाकर रखेंगे तो यह नष्ट नहीं होते हैं। साथ ही, कार्बन फाइबर जब नष्ट होते हैं तो मिट्‌टी में खतरनाक कार्बनिक रसायन छोड़ते हैं। इससे पर्यावरण को काफी खतरा होता है। प्राकृतिक नुकसान के साथ-साथ इस प्रकार की जमीन पर उपजने वाले अनाज, फल, सब्जियों से कैंसर का खतरा भी बढ़ता है।

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एमएमएमयूपी का ड्रोन काफी बेहतर
एमएमएमयूटी के छात्रों की ओर से तैयार कराया गया ड्रोन काफी बेहतर है। यह हल्का है। शक्तिशाली है। वजन के मामले में यह केवल 750 ग्राम का है। वहीं, इसकी फ्लाइट टाइम करीब सवा घंटे है। एक समय में यह करीब पांच किलोमीटर के क्षेत्र में निगरानी कर सकता है। साथ ही, निर्माण लागत में भी यह अन्य ड्रोन के मुकाबले काफी सस्ता है।

परंपरागत कार्बन फाइबर का बाजार मूल्य करीब 7 हजार रुपये किलोग्राम है। वहीं, पॉली लैक्टिक एसिड को तैयार करने में करीब 1200 रुपये प्रति किलोग्राम की लागत आती है। इससे निर्माण लागत भी कम होती है। डिजिटल इंडिया वीक के दौरान इसे पिछले दिनों पेश किया गया था। इंडियन मोबाइल कांग्रेस में भी यह ड्रोन आकर्षण के केंद्र में था।
टेक्निकल डेवलपमेंट पर काम जारी
ड्रोन को तकनीकी रूप से और शक्तिशाली बनाने की योजना पर काम चल रहा है। टेक्निकल एडवांसमेंट के जरिए इसको अधिक बेहतर बनाने की तैयारी है। ड्रोन की बॉडी में सोलर पैनल लगाने की योजना पर भी काम चल रहा है। इससे बैट्री के डिस्चार्ज होने की स्थिति में इसे अपने आप चार्ज किया जा सकेगा। यह ड्रोन की फ्लाइंग टाइम को बढ़ाएगा, साथ ही लंबे समय तक इससे निगरानी कराई जा सकेगी। एमएमएमयूटी के छात्र इस पर रिसर्च कर रहे हैं कि वजन को अधिक बढ़ाए बिना इसे कैसे इंस्टॉल किया जाए।
थ्री डी तकनीक से बॉडी प्रिंटिंग
एमएमएमयूटी के छात्रों ने बायोडिग्रेडेबल मैटेरियल से दो प्रकार के ड्रोन तैयार किए हैं। भूमि में नष्ट होने वाले इन ड्रोन के निर्माण से संस्थान के छात्र उत्साहित हैं। टीम के सदस्य विवेक शुक्ला और अंकित कुमार इसकी तकनीक के बारे में बताते हैं। उन्होंने कहा कि ड्रोन की बॉडी को पॉली लैक्टिक एसिड से तैयार किया गया है। इसके बाद थ्री-डी तकनीक से बॉडी की प्रिंटिंग की गई है। इसकी बॉडी और सेंसर दोनों पॉली लैक्टिक एसिड से तैयार किए गए हैं। इस कारण इसे हल्का रखने में मदद मिल सकी है।

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