महंगी फीस वसूलने वाले स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा के इंतजाम नाकाफी? पंचकूला और दिल्ली की घटनाओं ने खोली व्यवस्था की पोल
पंचकूला और दिल्ली की घटनाओं ने स्कूलों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पंचकूला में किंडरगार्टन की मासूम बच्ची पर तीसरी कक्षा के छात्र द्वारा ईंट, पत्थर और गमले से हमला किए जाने का आरोप है। वहीं, दिल्ली के जाफराबाद में तीन साल के बच्चे को कथित तौर पर कुर्सी से बांधकर पीटने का मामला सामने आया था। दोनों घटनाओं ने छोटे बच्चों की निगरानी और स्कूल प्रबंधन की जवाबदेही पर सवाल उठाए हैं।

नेशनल डेस्क। हरियाणा के पंचकूला में स्कूल परिसर के भीतर किंडरगार्टन की मासूम बच्ची पर हुए कथित हमले और दिल्ली के जाफराबाद स्थित प्ले-स्कूल में तीन साल के बच्चे के साथ कथित मारपीट की घटना ने एक बार फिर स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अभिभावक अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा और सुरक्षित माहौल की उम्मीद में स्कूल भेजते हैं, लेकिन जब स्कूल परिसर के भीतर ही मासूमों की सुरक्षा पर सवाल उठने लगें तो स्कूल प्रबंधन की जिम्मेदारी और प्रशासन की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
पंचकूला में 28 अक्टूबर 2026 को हुई घटना के संबंध में सामने आई जानकारी के अनुसार, तीसरी कक्षा में पढ़ने वाले एक छात्र पर किंडरगार्टन की बच्ची को बहाने से स्कूल की पहली मंजिल पर ले जाने और वहां ईंटों, पत्थरों, जूतों तथा गमले से हमला करने का आरोप है। बच्ची गंभीर रूप से घायल हुई और उसे उपचार के लिए पीजीआई चंडीगढ़ रेफर किया गया। घटना को लेकर सामने आए विवरण और तस्वीरों ने कई ऐसे सवाल खड़े किए हैं, जिनका जवाब स्कूल प्रबंधन को देना चाहिए। बताया जा रहा है कि बच्ची के साथ काफी देर तक मारपीट होती रही, लेकिन आसपास कोई अन्य छात्र या जिम्मेदार कर्मचारी दिखाई नहीं दिया। यदि यह पूरा घटनाक्रम स्कूल परिसर में हुआ, तो सवाल है कि इतने समय तक किसी शिक्षक, कर्मचारी या सुरक्षा कर्मी को इसकी जानकारी क्यों नहीं हुई? बच्चों की आवाजाही और गतिविधियों पर निगरानी रखने की जिम्मेदारी आखिर किसकी थी?
इससे पहले अगस्त 2026 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली के जाफराबाद स्थित एक प्ले-स्कूल में तीन साल के बच्चे के साथ कथित दुर्व्यवहार का मामला सामने आया था। आरोप था कि बच्चे को घंटों कुर्सी से बांधकर रखा गया और उसके साथ मारपीट की गई। सीसीटीवी फुटेज सामने आने के बाद पुलिस ने मामला दर्ज किया था। स्कूल के एक कर्मचारी को हिरासत में लिया गया और एक शिक्षिका की भूमिका की भी जांच की गई। बाद में दिल्ली सरकार के निर्देश पर संबंधित प्ले-स्कूल को सील करने की कार्रवाई की गई थी।
दोनों घटनाओं की परिस्थितियां अलग-अलग हैं। पंचकूला के मामले में दूसरे छात्र पर बच्ची पर हमला करने का आरोप है, जबकि जाफराबाद के मामले में स्कूल कर्मचारी पर बच्चे के साथ दुर्व्यवहार का आरोप लगा। लेकिन दोनों घटनाओं ने स्कूलों में छोटे बच्चों की सुरक्षा, निगरानी और जवाबदेही को लेकर एक जैसी चिंता पैदा की है। खासकर यह सवाल महत्वपूर्ण है कि नर्सरी, किंडरगार्टन और प्राथमिक कक्षाओं के बच्चों की देखरेख के लिए स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक और कर्मचारी तैनात हैं या नहीं।
आज अनेक निजी स्कूल भारी फीस वसूलते हैं और अभिभावकों को बेहतर सुविधाएं देने का दावा करते हैं। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि जब स्कूल शिक्षा के नाम पर मोटी फीस लेते हैं, तो बच्चों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त इंतजाम क्यों नहीं किए जाते? केवल आकर्षक भवन, आधुनिक कक्षाएं और सुविधाओं के प्रचार से स्कूल की जिम्मेदारी पूरी नहीं हो जाती। बच्चों की सुरक्षा के लिए प्रशिक्षित स्टाफ, सतत निगरानी और आपात स्थिति से निपटने की स्पष्ट व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी है।
सीसीटीवी कैमरे लगाना सुरक्षा का एक हिस्सा हो सकता है, लेकिन केवल कैमरों की मौजूदगी को सुरक्षा की गारंटी नहीं माना जा सकता। यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि कैमरे लगातार काम कर रहे हों, उनकी नियमित निगरानी हो और किसी अप्रिय स्थिति में तत्काल सहायता पहुंचाने के लिए जिम्मेदार कर्मचारी उपलब्ध रहें। कक्षाओं, गलियारों, सीढ़ियों और अन्य संवेदनशील स्थानों पर बच्चों की गतिविधियों पर नजर रखने की व्यवस्था होनी चाहिए। छोटे बच्चों को बिना किसी जिम्मेदार कर्मचारी की देखरेख के अकेला नहीं छोड़ा जाना चाहिए।
पंचकूला की घटना में यह सवाल विशेष रूप से गंभीर है कि यदि एक बच्ची पर लंबे समय तक हमला होता रहा, तो स्कूल में मौजूद किसी कर्मचारी को इसकी भनक क्यों नहीं लगी। क्या उस समय संबंधित हिस्से में निगरानी की व्यवस्था नहीं थी? क्या वहां कोई शिक्षक या कर्मचारी तैनात नहीं था? क्या सीसीटीवी कैमरे काम कर रहे थे? इन सवालों का जवाब जांच और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर सामने आना चाहिए। किसी भी छात्र पर लगे आरोप की निष्पक्ष जांच जरूरी है, लेकिन इसके साथ स्कूल प्रबंधन की निगरानी व्यवस्था की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।
शिक्षा विभाग और संबंधित प्रशासन को ऐसी घटनाओं को गंभीर चेतावनी मानते हुए स्कूलों की सुरक्षा व्यवस्था का व्यापक निरीक्षण कराना चाहिए। विशेष रूप से छोटे बच्चों को पढ़ाने वाले स्कूलों में कर्मचारियों की संख्या, उनकी जिम्मेदारियों, सीसीटीवी व्यवस्था और आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली की जांच होनी चाहिए। किसी घटना के बाद स्कूल प्रबंधन अपनी जिम्मेदारी से बच न सके, इसके लिए जवाबदेही तय करने की स्पष्ट व्यवस्था जरूरी है। घटना की सूचना अभिभावकों और संबंधित अधिकारियों को समय पर देना, सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखना और निष्पक्ष जांच में सहयोग करना स्कूल प्रशासन का दायित्व होना चाहिए।
अभिभावक अपने बच्चों को स्कूल केवल पढ़ाई के लिए नहीं भेजते, बल्कि इस भरोसे के साथ भेजते हैं कि वहां उनकी सुरक्षा का भी पूरा ध्यान रखा जाएगा। यह भरोसा तभी कायम रह सकता है, जब स्कूल प्रबंधन शिक्षा के साथ बच्चों की निगरानी और सुरक्षा को भी सर्वोच्च प्राथमिकता दे। पंचकूला और दिल्ली की घटनाएं याद दिलाती हैं कि बच्चों की सुरक्षा केवल नियमों और सीसीटीवी कैमरों तक सीमित नहीं रह सकती। इसके लिए हर समय सतर्क निगरानी, पर्याप्त जिम्मेदार कर्मचारी और जवाबदेह स्कूल प्रबंधन जरूरी है। आखिर स्कूल परिसर में बच्चों की सुरक्षा कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं, बल्कि स्कूल की बुनियादी जिम्मेदारी है।




