महाराष्ट्र के नए धर्मांतरण कानून को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती

महाराष्ट्र में जबरन, धोखे या लालच से होने वाले धर्म परिवर्तन रोकने को बनाए गए कानून को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। महाराष्ट्र में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की स्वीकृति के बाद लागू हो चुके इस कानून में तहत आने वाले सभी अपराध गैर जमानती की श्रेणी में रखे गए हैं।

Maharashtra new anti conversion law challenged in Bombay High Court
महाराष्ट्र के नए धर्मांतरण विरोधी कानून को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी गई है।

मुंबई/एजेंसी। महाराष्ट्र में लागू नए धर्मांतरण कानून, ‘महाराष्ट्र फ्रीडम ऑफ रिलिजन एक्ट, 2026’ की संवैधानिक वैधता को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। 70 वर्षीय इस्लामी विद्वान मौलाना हलीमुल्लाह फारूक अहमद खान ने कानून के खिलाफ याचिका दायर करते हुए इसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया है। याचिका में कानून के विभिन्न प्रावधानों की संवैधानिकता पर सवाल उठाते हुए उन्हें रद्द करने अथवा उनकी व्याख्या जबरन, धोखाधड़ी या दबाव के जरिए होने वाले धर्मांतरण तक सीमित रखने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि जबरन, धोखाधड़ी या प्रलोभन के जरिए होने वाले विवाह और धर्मांतरण को रोकना राज्य का वैध उद्देश्य हो सकता है, लेकिन आपसी सहमति से बने अंतरधार्मिक संबंधों और स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन को इसी दायरे में नहीं रखा जा सकता। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया है कि व्यक्ति को अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने तथा अपनी धार्मिक आस्था निर्धारित करने का अधिकार उसकी व्यक्तिगत स्वायत्तता, गरिमा, निजता और निर्णय लेने की स्वतंत्रता से जुड़ा है।
याचिका में संविधान के अनुच्छेद 21 और 25 का हवाला देते हुए कहा गया है कि व्यक्ति की निजी पसंद और धार्मिक स्वतंत्रता को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है। याचिकाकर्ता ने कानून में धर्म परिवर्तन से पहले जिला मजिस्ट्रेट को 60 दिन पहले लिखित सूचना देने की अनिवार्यता पर भी आपत्ति जताई है। याचिका के अनुसार, इस तरह की पूर्व सूचना की अनिवार्यता व्यक्ति की निजता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकती है।
महाराष्ट्र विधानसभा के दोनों सदनों से पारित होने और संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद यह कानून 28 अगस्त 2026 से पूरे राज्य में प्रभावी हुआ है। कानून का उद्देश्य बल, धोखाधड़ी, दबाव, प्रलोभन, लालच, अनुचित प्रभाव अथवा विवाह का झांसा देकर कराए जाने वाले धर्मांतरण पर रोक लगाना बताया गया है। कानून के तहत स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्ति के लिए भी निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य किया गया है।
कानून के प्रावधानों के अनुसार, धर्म परिवर्तन करने के इच्छुक व्यक्ति को निर्धारित प्रक्रिया के तहत कम से कम 60 दिन पहले जिला मजिस्ट्रेट को लिखित सूचना देनी होगी। कानून में उल्लंघन के मामलों में सजा और जुर्माने का भी प्रावधान किया गया है। पहली बार दोषी पाए जाने पर सात वर्ष तक की सजा और एक लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान बताया गया है।
इस कानून का कांग्रेस सहित विपक्षी दलों ने विधानसभा में विरोध किया था। अब कानून की संवैधानिक वैधता को हाईकोर्ट में चुनौती दिए जाने के बाद महाराष्ट्र में इस मुद्दे पर राजनीतिक और कानूनी बहस तेज होने की संभावना है। फिलहाल याचिका में उठाए गए संवैधानिक सवालों पर अदालत की सुनवाई और आगे की न्यायिक प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।

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