नीब करौरी से कैंची धाम तक, ऐसे बनी नीम करौली बाबा की पहचान की कहानी,बाबा के पौत्र ने किया बड़ा खुलासा
'नीब करौरी बाबा' नाम सुनते ही जेहन में उत्तराखंड के 'कैंचीधाम' की तस्वीर सामने आती है, लेकिन क्या आप जानते हैं, यह असली 'नीब करौरी' स्थान नहीं है, जिसे बाबा की तपोस्थली कहा जाता है, जहां ट्रेन रोकने की घटना बताई जाती है, वह स्थान यूपी में हैं।

भोपाल,एजेंसी। नीम करौली बाबा, जिन्हें नीब करौरी बाबा के नाम से भी जाना जाता है, का वास्तविक नाम लक्ष्मी नारायण शर्मा बताया जाता है। उनका नाम सामने आते ही उत्तराखंड के नैनीताल जिले में स्थित कैंची धाम की तस्वीर लोगों के मन में उभरती है। आज कैंची धाम देश-दुनिया में बाबा के प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र के रूप में प्रसिद्ध है, लेकिन बाबा के नाम और उनकी साधना से जुड़ी कहानी की जड़ उत्तराखंड से कहीं पहले उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले के नीब करौरी गांव तक पहुंचती है।
भोपाल में रहने वाले बाबा के पौत्र धनंजय शर्मा के कई वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर प्रसारित हो रहे हैं। उनके अनुसार बाबा के जीवन का महत्वपूर्ण समय फर्रुखाबाद जिले के नीब करौरी क्षेत्र में बीता था और यही स्थान उनकी तपोस्थली रहा। यहां स्थित प्राचीन हनुमान मंदिर और गुफा को बाबा की साधना से जुड़े प्रमुख स्थलों के रूप में माना जाता है। बताया जाता है कि इसी स्थान के कारण उन्हें ‘नीब करौरी बाबा’ कहा जाने लगा और बाद में नाम के अपभ्रंश के चलते यह ‘नीम करौली बाबा’ के रूप में प्रचलित हो गया।
जीवनी संबंधी और आश्रम से जुड़े विवरणों के अनुसार बाबा का जन्म उत्तर प्रदेश के अकबरपुर गांव में हुआ था। साधना और भ्रमण के दौरान वे फर्रुखाबाद के नीब करौरी गांव पहुंचे। परंपरा के अनुसार उन्होंने यहां स्थित गुफा में लंबे समय तक साधना की। यही वह स्थान माना जाता है, जहां से ‘नीब करौरी बाबा’ नाम उनके साथ जुड़ा और धीरे-धीरे प्रसिद्ध होता गया। नीब करौरी की गुफा और हनुमान मंदिर आज भी बाबा की साधना की स्मृतियों से जुड़े प्रमुख स्थल माने जाते हैं।
बाबा के जीवन से जुड़े लोगों के अनुसार फर्रुखाबाद की यह तपोस्थली उनके आध्यात्मिक जीवन की महत्वपूर्ण कड़ी थी। दूसरी ओर उत्तराखंड का कैंची धाम उनके नाम और संदेश को देश-दुनिया में व्यापक पहचान दिलाने वाला प्रमुख केंद्र बना। नैनीताल क्षेत्र में स्थित कैंची धाम का निर्माण वर्ष 1964 में हुआ। यहां हनुमान मंदिर की स्थापना के बाद यह स्थान धीरे-धीरे बाबा के अनुयायियों और श्रद्धालुओं के बीच प्रसिद्ध होता गया।
इस प्रकार कैंची धाम बाबा की पहचान का सबसे चर्चित आधुनिक केंद्र जरूर बना, लेकिन ‘नीब करौरी’ नाम की जड़ फर्रुखाबाद की उस तपोस्थली से जुड़ी बताई जाती है। इसी अंतर के कारण कई बार लोगों में यह भ्रम हो जाता है कि कैंची धाम ही बाबा की मूल तपोस्थली थी, जबकि उनके जीवन और साधना की यात्रा इससे पहले ही फर्रुखाबाद के नीब करौरी तक पहुंच चुकी थी।
बाबा का जीवन उत्तर प्रदेश के अकबरपुर से लेकर फर्रुखाबाद, उत्तराखंड के कैंची धाम और अंततः वृंदावन तक विभिन्न महत्वपूर्ण स्थानों से जुड़ा रहा। उपलब्ध जीवनी संबंधी विवरणों के अनुसार उनका अंतिम समय वृंदावन में बीता और 11 सितंबर 1973 को उनका निधन हुआ। वृंदावन स्थित आश्रम परिसर में उनकी महासमाधि बनी।
नीम करौली बाबा की लोकप्रियता उनके निधन के बाद भी लगातार बढ़ती रही। भारत के अलावा विदेशों में भी उनके अनुयायी बने। बाबा से जुड़े साहित्य और भक्त परंपरा में अमेरिकी उद्यमी स्टीव जॉब्स सहित कई विदेशी श्रद्धालुओं के कैंची धाम आने का उल्लेख मिलता है। आज कैंची धाम दुनिया भर में बाबा के अनुयायियों के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र है, जबकि फर्रुखाबाद का नीब करौरी गांव उनके नाम और साधना की उस शुरुआती कड़ी की याद दिलाता है, जिसने आगे चलकर उन्हें ‘नीब करौरी बाबा’ के रूप में पहचान दिलाई।




