यूपी के सरकारी स्कूलों की स्थिति दिखाने वाले वालों पर एफआईआर, यूट्यूबर्स और पत्रकारों की नो एंट्री

लखनऊ, नोएडा समेत यूपी के नौ जिलों में स्‍कूलों में घुसकर वीडियो बनाने वालों पर केस दर्ज किया गया है। बीएसए का सख्‍त निर्देश है कि बिना इजाजत बाहरी लोगों को स्‍कूल में ना घुसने दिया जाए।

लखनऊ/एजेंसी। उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों में कथित अव्यवस्थाओं और गड़बड़ियों को सामने लाने वाले सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं तथा अन्य लोगों के खिलाफ कार्रवाई का मामला अब कई जिलों तक पहुंच गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार प्रदेश के कम से कम नौ जिलों में स्कूल परिसरों में बिना अनुमति फोटो या वीडियो बनाने को लेकर प्राथमिकी दर्ज की गई हैं। वहीं, कई अन्य जिलों में बेसिक शिक्षा अधिकारियों की ओर से यूट्यूबर्स, सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं और बाहरी लोगों के स्कूलों में प्रवेश तथा रिकॉर्ड या गतिविधियों की रिकॉर्डिंग को लेकर दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं।
इन मामलों में लखनऊ, हाथरस, बुलंदशहर, देवरिया, मेरठ, नोएडा, गाजीपुर, सिद्धार्थनगर और वाराणसी के सरकारी स्कूलों की स्थिति से संबंधित वीडियो सामने आने के बाद कार्रवाई किए जाने की बात कही जा रही है। प्रशासन की ओर से जारी निर्देशों में छात्रों की सुरक्षा, शिक्षण कार्य में व्यवधान तथा स्कूल के अभिलेखों तक अनधिकृत पहुंच जैसे कारणों का हवाला दिया गया है।
फर्रुखाबाद से शुरू हुआ था निर्देशों का सिलसिला
जानकारी के मुताबिक फर्रुखाबाद के बेसिक शिक्षा अधिकारी विश्वनाथ प्रताप सिंह ने 17 अप्रैल 2026 को एक परिपत्र जारी किया था। इसमें आरोप लगाया गया था कि कुछ लोग पत्रकार के रूप में स्कूल परिसरों में प्रवेश कर रहे हैं, स्कूल के अभिलेख देख रहे हैं और छात्रों की तस्वीरें तथा वीडियो बना रहे हैं। इसके बाद अन्य जिलों में भी स्कूल परिसरों में बाहरी लोगों की गतिविधियों को लेकर इसी तरह के निर्देश जारी किए जाने की जानकारी सामने आई।
प्रशासन का तर्क है कि स्कूलों में पढ़ाई के दौरान अनधिकृत रूप से वीडियो रिकॉर्डिंग करने से शिक्षण व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा विद्यार्थियों की निजता और सुरक्षा से जुड़े सवाल भी उठते हैं। इसी आधार पर स्कूलों में बाहरी व्यक्तियों के प्रवेश और रिकॉर्डिंग को नियंत्रित करने की कोशिश की जा रही है।
ताजा मामला लखनऊ के गोसाईंगंज क्षेत्र का बताया जा रहा है। बेगरियामऊ स्थित पूर्व माध्यमिक विद्यालय में बिना अनुमति वीडियो बनाए जाने के आरोप में स्कूल की इंचार्ज अध्यापिका विनीता श्रीवास्तव की ओर से 25 अगस्त को प्राथमिकी दर्ज कराई गई है।
शिकायत के मुताबिक 20 अगस्त को विद्यालय में परीक्षा चल रही थी। इसी दौरान अमित यादव नामक व्यक्ति, जिसे निजी चैनल का प्रतिनिधि बताया जा रहा है, कुछ अन्य लोगों के साथ विद्यालय पहुंचा। आरोप है कि उनके द्वारा विद्यालय के शौचालय, साफ-सफाई और पेयजल व्यवस्था समेत अन्य स्थानों का वीडियो बनाया गया।
शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि वहां मौजूद दो महिला अध्यापकों पर बातचीत करने का दबाव बनाया गया। विद्यालय प्रशासन की ओर से इसे बिना अनुमति परिसर में प्रवेश और रिकॉर्डिंग से जुड़ा मामला बताया गया है। पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज कर मामले की जांच शुरू कर दी है।
दूसरी ओर, इस पूरे मामले को लेकर आम जनता और कुछ मीडिया कर्मियों की ओर से अलग-अलग सवाल भी उठाए जा रहे हैं। उनका आरोप है कि सरकारी स्कूलों में मौजूद कथित अव्यवस्थाओं, अनियमितताओं या भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों को सामने आने से रोकने के लिए बाहरी लोगों और पत्रकारों पर कार्रवाई की जा रही है।
कुछ लोगों का कहना है कि यदि स्कूलों की व्यवस्थाएं और सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन पारदर्शी है तो पत्रकारों अथवा नागरिकों द्वारा उठाए जा रहे सवालों का तथ्यात्मक जवाब दिया जाना चाहिए। उनका आरोप है कि प्राथमिकी दर्ज कराने की कार्रवाई से पत्रकारों और मीडिया संस्थानों में भय का माहौल पैदा हो सकता है, जिससे सरकारी स्कूलों से जुड़ी समस्याओं की स्वतंत्र रिपोर्टिंग प्रभावित होने की आशंका है।
हालांकि, इन आरोपों और प्रत्यारोपों के बीच यह भी महत्वपूर्ण है कि बिना अनुमति स्कूल परिसर में प्रवेश, विद्यार्थियों की रिकॉर्डिंग अथवा स्कूल के अभिलेखों तक पहुंच के संबंध में लागू नियमों का पालन किया जाए। वहीं, सरकारी स्कूलों में कथित अव्यवस्थाओं और भ्रष्टाचार की शिकायतों की निष्पक्ष जांच तथा सार्वजनिक हित से जुड़े मामलों की पारदर्शी रिपोर्टिंग भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
फिलहाल नौ जिलों में दर्ज मामलों और विभिन्न जिलों से जारी निर्देशों ने सरकारी स्कूलों में पत्रकारिता, सोशल मीडिया रिपोर्टिंग और स्कूल प्रशासन के अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर नई बहस छेड़ दी है। पूरे मामले में दर्ज प्राथमिकी, संबंधित विभागों के आदेश और पुलिस जांच के निष्कर्ष सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि किन मामलों में नियमों का उल्लंघन हुआ और किन मामलों में स्कूलों की व्यवस्थाओं से जुड़े आरोपों की वास्तविकता क्या है।

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