भाई-बहन के प्रेम और रक्षा संकल्प का पावन पर्व है रक्षाबंधन
रक्षा बंधन का इतिहास हिंदू पुराण कथाओं में है। हिंदू पुराण कथाओं के अनुसार, महाभारत में पांडवों की पत्नी द्रौपदी ने भगवान श्रीकृष्ण की कलाई से बहते खून (श्रीकृष्ण ने भूल से खुद को जख्मी कर दिया था) को रोकने के लिए अपनी साड़ी का किनारा फाड़ कर बांधा था।

श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला रक्षाबंधन भाई-बहन के अटूट प्रेम, स्नेह और विश्वास का प्रतीक पर्व है। इस दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षासूत्र बांधकर उनके सुख, समृद्धि और विजय की कामना करती हैं, वहीं भाई जीवनभर बहन की रक्षा करने का संकल्प लेते हैं। पर्व को लेकर घरों में विशेष तैयारियां की जाती हैं और बाजारों में भी राखियों तथा मिठाइयों की रौनक देखने को मिलती है।
रक्षाबंधन के अवसर पर प्रातः स्नान आदि से निवृत्त होकर महिलाएं और युवतियां पूजा की थाली सजाती हैं। थाली में राखी के साथ रोली या हल्दी, अक्षत, दीपक और मिठाई रखी जाती है। इसके बाद शुभ मुहूर्त में भाई को आसन पर बैठाकर पहले इष्ट देव की पूजा की जाती है। बहन भाई के माथे पर तिलक लगाकर अक्षत अर्पित करती है, आरती उतारती है और उसकी दाहिनी कलाई पर राखी बांधती है। इसके बाद भाई अपनी बहन को उपहार अथवा धनराशि देकर उसके सुखी जीवन की कामना करता है।
रक्षाबंधन में राखी अथवा रक्षासूत्र का विशेष महत्व माना गया है। राखी साधारण कच्चे सूत से लेकर रंगीन कलावे, रेशमी धागों तथा सोने-चांदी जैसे कीमती धातुओं से बनी हो सकती है। समय के साथ राखियों के स्वरूप में भी काफी बदलाव आया है, लेकिन भाई-बहन के प्रेम और रक्षा के भाव का महत्व आज भी कायम है।
भगवान श्रीकृष्ण और द्रौपदी से जुड़ी मान्यता
रक्षाबंधन से जुड़ी पौराणिक कथाओं में भगवान श्रीकृष्ण और द्रौपदी का प्रसंग प्रमुखता से बताया जाता है। मान्यता के अनुसार, एक बार भगवान श्रीकृष्ण की कलाई से रक्त बहने लगा। इसे देखकर द्रौपदी ने अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर उनकी कलाई पर बांध दिया। श्रीकृष्ण ने इस स्नेह के बदले द्रौपदी की रक्षा का वचन दिया। मान्यता है कि महाभारत में चीरहरण के समय श्रीकृष्ण ने द्रौपदी की लाज बचाकर अपने वचन को निभाया।
इतिहास में भी मिलते हैं रक्षासूत्र के उदाहरण
मध्यकालीन इतिहास में भी रक्षाबंधन से जुड़ी एक चर्चित घटना का उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि चित्तौड़ की रानी कर्मवती ने मुगल शासक हुमायूं को राखी भेजकर भाई के रूप में स्वीकार किया था। हुमायूं ने राखी के सम्मान को स्वीकार करते हुए उनकी रक्षा के लिए सहायता की। यह प्रसंग रक्षासूत्र के सामाजिक और भावनात्मक महत्व को दर्शाता है।
इंद्राणी ने इंद्र को बांधा था रक्षा सूत्र
रक्षाबंधन की व्रत कथा में देवताओं और दानवों के बीच हुए युद्ध का भी उल्लेख मिलता है। कथा के अनुसार, लंबे समय तक चले युद्ध में देवताओं को पराजय का सामना करना पड़ा। इसके बाद देवताओं के राजा इंद्र ने अपने गुरु बृहस्पति से मार्गदर्शन लिया। श्रावण पूर्णिमा के दिन रक्षा विधान किया गया और इंद्राणी ने स्वस्तिवाचन के बाद इंद्र की दाहिनी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा। मान्यता है कि इसके बाद इंद्र ने दानवों पर विजय प्राप्त की।
एकता और भाईचारे का संदेश देता है पर्व
रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के रिश्ते तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रेम, विश्वास, एकता और सामाजिक सद्भाव का संदेश भी देता है। इतिहास के विभिन्न दौर में महिलाओं द्वारा पुरुषों को राखी बांधकर उन्हें भाई के रूप में स्वीकार करने की परंपरा का भी उल्लेख मिलता है। इस तरह रक्षासूत्र सामाजिक रिश्तों को मजबूत करने और आपसी सहयोग की भावना को बढ़ाने का माध्यम बना।
रक्षाबंधन के अवसर पर ब्राह्मणों द्वारा पवित्र जनेऊ बदलने की परंपरा भी कई स्थानों पर निभाई जाती है। यह दिन धार्मिक अध्ययन और आध्यात्मिक संकल्प के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है। भाई-बहन के स्नेह से जुड़े इस पर्व का मूल संदेश यही है कि रिश्तों में प्रेम, विश्वास और एक-दूसरे की रक्षा का संकल्प जीवनभर बना रहे।




