दारुल उलूम से हटेगी अफगानिस्तान के बादशाह की निशानी, गिराया जाएगा बाब-ए-जाहिर गेट
दारुल उलूम देवबंद परिसर का 86 वर्ष पुराना ऐतिहासिक बाब-ए-जाहिर द्वार को सुरक्षा कारणों से गिराने का निर्णय लिया है।

सहारनपुर/उत्तर प्रदेश। दारुल उलूम देवबंद परिसर का 86 वर्ष पुराना ऐतिहासिक बाब-ए-जाहिर द्वार अब इतिहास का हिस्सा बनने जा रहा है। जर्जर हो चुके इस प्रवेश द्वार को सुरक्षा कारणों से हटाने का निर्णय संस्था की ओर से लिया गया है। दारुल उलूम के मोहतमिम मौलाना खालिक मद्रासी ने इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि गेट की स्थिति काफी खराब हो चुकी है और इसके कारण किसी हादसे की आशंका बनी हुई है। संस्था के अनुसार, आगामी दो दिनों में गेट को मिस्मार यानी ढहाने की कार्रवाई की जाएगी।
बाब-ए-जाहिर द्वार दारुल उलूम देवबंद परिसर की ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल रहा है। यह केवल परिसर का प्रवेश मार्ग नहीं, बल्कि अफगानिस्तान के पूर्व शासक जहीर शाह और दारुल उलूम देवबंद के बीच रहे ऐतिहासिक संबंधों की याद भी अपने भीतर समेटे हुए है।
जानकारी के अनुसार, वर्ष 1940 में तत्कालीन अफगान शासक जहीर शाह ने अपने निजी खर्च से दारुल उलूम के छात्रावास परिसर में इस गेट का निर्माण कराया था। उस समय हिजरी कैलेंडर के अनुसार वर्ष 1359 चल रहा था। जहीर शाह के नाम पर ही बाद में इस प्रवेश द्वार की पहचान बाब-ए-जाहिर के रूप में होने लगी।
बताया जाता है कि गेट के दोनों ओर बच्चों के लिए हिफ्ज यानी कुरआन कंठस्थ करने की कक्षाएं संचालित करने के लिए भवन बनाए गए थे। समय के साथ यह द्वार दारुल उलूम परिसर के प्रमुख चार प्रवेश द्वारों में शामिल हो गया और संस्था के इतिहास में इसका विशेष महत्व स्थापित हुआ।
जहीर शाह का दारुल उलूम देवबंद से संबंध केवल बाब-ए-जाहिर द्वार के निर्माण तक सीमित नहीं था। वर्ष 1958 में भारत यात्रा के दौरान वह दारुल उलूम देवबंद भी पहुंचे थे। उस समय संस्था के लंबे समय तक मोहतमिम रहे कारी मुहम्मद तैय्यब ने उनका स्वागत किया था। जहीर शाह की इस यात्रा और संस्था से उनके संबंधों के कारण भी बाब-ए-जाहिर को ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता रहा।
बाब-ए-जाहिर द्वार को हटाने का मामला पहली बार सामने नहीं आया है। दारुल उलूम परिसर में नए भवनों के निर्माण की योजना के दौरान वर्ष 2006 में भी इस ऐतिहासिक गेट को हटाने का निर्णय लिया गया था। हालांकि उस समय जहीर शाह जीवित थे और उन्होंने ऐतिहासिक द्वार को हटाए जाने के फैसले पर आपत्ति जताई थी। इसके बाद गेट को हटाने की कार्रवाई रोक दी गई थी।
समय बीतने के साथ गेट की स्थिति लगातार कमजोर होती गई। परिसर में नए छात्रावास भवनों का निर्माण भी हुआ, लेकिन ऐतिहासिक द्वार की मरम्मत या व्यापक जीर्णोद्धार के बजाय अब इसकी जर्जर स्थिति को देखते हुए इसे पूरी तरह हटाने का फैसला लिया गया है।
मोहतमिम मौलाना खालिक मद्रासी ने कहा कि बाब-ए-जाहिर द्वार काफी जर्जर हो चुका है। इसकी मौजूदा स्थिति को देखते हुए परिसर में आने-जाने वाले लोगों की सुरक्षा को खतरा उत्पन्न हो सकता है। किसी संभावित दुर्घटना को देखते हुए संस्था ने इसे हटाने का निर्णय लिया है। आगामी दो दिनों में गेट को ढहाने की कार्रवाई किए जाने की बात कही गई है।




