कश्मीर में हिमालयी काले भालुओं की दहशत, अब तक 5 से ज्यादा बने शिकार

घाटी के गांदरबल, कुपवाड़ा और बारामूला जैसे कई हिस्सों में हिमालयी काले भालुओं के हमलों से दहशत का माहौल है, जिससे लोग भयभीत होकर बागों में जाने से कतरा रहे हैं। वन्यजीव अधिकारियों ने बताया कि भोजन और आश्रय की तलाश में भालू बस्तियों के करीब आ रहे हैं, जिसमें जलवायु परिवर्तन भी एक कारक है।
श्रीनगर/एजेंसी। घाटी के कई हिस्सों विशेषकर गांदरबल, कुपवाड़ा व गांदरबल में हिमालयी काले भालूओं ने तांड़व मचा रखा है। यह भालू ,गांवों,बगीचों में घुस लोगों पर हमले कर रहे हैं। पिछले चार दिनों में उक्त जिलों में भालू के अलग-अलग हमलों में तीन लोग घायल हो गए। इन घटनाओं से लोग भयभीत हो गए हैं। वन्यजीव अधिकारियों ने कहा कि भोजन और आश्रय की तलाश में भालू वसंत ऋतु के अंतिम चरण और ग्रीष्म ऋतु के आरंभ में बस्तियों के करीब आ जाते हैं। उत्तरी कश्मीर के कुछ हिस्सों में ग्रामीणों ने कहा कि बागों और आवासीय क्षेत्रों के पास बार-बार भालू देखे जाने और हमलों के बाद भय का माहौल है। कुपवाड़ा जिले के निवासी खुरशीद ने कहा, हम अब डर के साए में जी रहे हैं।
लोग अकेले बागों में जाने से बचते हैं, खासकर सुबह और शाम के समय। बच्चे और बुजुर्ग सबसे ज्यादा डरे हुए हैं। ताजा घटना 6 मई को हुई। अधिकारियों ने बताया कि गांदरबल जिले के गुंड अकु वन क्षेत्र में 32 वर्षीय जाहिदा बेगम पर भालू ने हमला कर दिया। उन्हें श्रीनगर के शेर-ए-कश्मीर आयुर्वेद संस्थान (एसकेआईएमएस) में भर्ती कराया गया है, जहां उनका इलाज चल रहा है। एक दिन पहले, कुपवाड़ा जिले के लावूसा के पुथवारी नौगाम वन क्षेत्र में 32 वर्षीय हमीदा बेगम भालू के हमले में घायल हो गईं।
उनका इलाज श्रीनगर जीएमसी में चल रहा है। 3 मई को, बारामूला जिले के शेरी नारवाव के गुलिस्तान बाला क्षेत्र में मुदस्सिर अहमद चानीजा नामक एक युवक भालू के हमले में घायल हो गए। अधिकारियों ने बताया कि चानीजा मवेशियों के साथ गुवास बुदुन क्षेत्र गए थे, तभी सुबह करीब 9 बजे एक भालू ने उन पर हमला कर दिया। उनका इलाज जीएमसी बारामूला में चल रहा है।
अप्रैल से मई तक 5 से ज्यादा लोग बने शिकार
अप्रैल में भी भालू के कई हमले दर्ज किए गए। वन्यजीव अधिकारियों ने संवेदनशील क्षेत्रों में पिंजरों का उपयोग करके दर्जनों भालुओं को पकड़ा। 20 अप्रैल को, जलील अहमद खान नामक एक व्यक्ति भालू के हमले में घायल हो गए। बारामूला जिले के पहलीपोरा-बोनियार के हकापथरी इलाके में। 8 अप्रैल को, उड़ी के कमालकोट के मडियान इलाके में भालू के हमले में दो लोग घायल हो गए। वन्यजीव अधिकारियों ने बताया कि फल लगने का मौसम शुरू होने से भालू बागों और गांवों के करीब आ जाते हैं।
शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय-कश्मीर के वन्यजीव संरक्षण विभाग के प्रमुख खुर्शीद अहमद शाह ने कहा कि इस दौरान ऐसी घटनाएं बढ़ जाती हैं। उन्होंने कहा,भालू द्वारा लोगों पर हमलों की घटनाएं निश्चित रूप से ये बढ़ रही हैं। लेकिन घटनाओं के पैटर्न की बात करें तो, कुछ क्षेत्रों को छोड़कर गर्मियों में ये मामूली रूप से बहुत कम होती हैं।
उत्तरी कश्मीर के वन्यजीव वार्डन सुहैल इंतेसार ने बताया कि खुबानी पकनी शुरू हो गई हैं और घनी वनस्पति भालुओं को बागों में घूमने के लिए बेहतर आवरण प्रदान करती है। इंतेसार ने कहा, यह मौसम फलों के पकने की शुरुआत का प्रतीक है। घास और पत्तों के घने होने से भालुओं को बागों में घूमने के लिए बेहतर आवरण मिलता है।
भालुओं को प्रभावित कर रहा जलवायु परिवर्तन
इंतेसार ने कहा कि जलवायु परिवर्तन भी भालुओं की आवाजाही को प्रभावित कर रहा है।उन्होंने कहा, सर्दियों में निचले इलाकों में देर से होने वाली बर्फबारी के कारण भालू शीतनिद्रा को स्थगित कर सकते हैं या पूरी तरह से छोड़ भी सकते हैं। वह आवासीय क्षेत्रों में पूरी सर्दी सक्रिय रह सकते हैं। उन्होंने कहा, शरद ऋतु में बागों में बचे हुए सेब इन भालुओं का भोजन बन जाते हैं। इसलिए, अब इन भालुओं को हर मौसम में – शरद ऋतु, सर्दी, वसंत और यहां तक कि गर्मी में भी – बस्तियों में घूमते देखा जा सकता है।
एक अन्य वन्यजीव अधिकारी ने घरों और रसोई के कचरे को, जिस पर ध्यान नहीं दिया जाता, भालुओं के रिहायशी इलाकों में आने का कारण बताया। अधिकारी ने कहा, जिन इलाकों में भालू घूम रहे हैं, वहां बंजर भूमि और निजी जमीनों पर कचरा बिखरा हुआ देखा जा सकता है। अगर उन्हें यहां आश्रय और भोजन मिल जाता है, तो वे जंगलों में क्यों लौटेंगे? अधिकारी ने बताया कि विभाग ने निगरानी बढ़ा दी है और भालुओं की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए कैमरों और ड्रोन का इस्तेमाल कर रहा है।




