26 साल बाद मिला न्याय, सीबीआई के मौजूदा जॉइंट डायरेक्टर और दिल्ली पुलिस के रिटायर्ड एसीपी दोषी करार

दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट ने 26 साल बाद दो बड़े अधिकारियों को एक मामले में दोषी ठहराया है। इनमें सीबीआई के मौजूदा जॉइंट डायरेक्टर और दिल्ली पुलिस के एक रिटायर्ड एसीपी शामिल हैं। दोनों को मारपीट, आपराधिक घुसपैठ और शरारत के मामलों में दोषी ठहराया गया है।
नई दिल्ली/एजेंसी। दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट ने 26 साल बाद दो बड़े अधिकारियों को एक मामले में दोषी ठहराया है। इनमें सीबीआई के मौजूदा जॉइंट डायरेक्टर और दिल्ली पुलिस के एक रिटायर्ड एसीपी शामिल हैं। दोनों को मारपीट, आपराधिक घुसपैठ और शरारत के मामलों में दोषी ठहराया गया है। कोर्ट ने सजा पर दलीलें सुनने के लिए मामले को 27 अप्रैल को सूचीबद्ध किया है।
ऊंचे पदों पर बैठे अधिकारियों द्वारा शक्तियों के दुरुपयोग से जुड़े एक अहम फैसले में तीस हजारी कोर्ट ने शनिवार को सीबीआई के मौजूदा जॉइंट डायरेक्टर और दिल्ली पुलिस के एक रिटायर्ड असिस्टेंट कमिश्नर (एसीपी) को मारपीट, आपराधिक घुसपैठ और शरारत के मामलों में दोषी ठहराया। यह मामला लगभग 26 साल पहले पूर्व आईआरएस अधिकारी अशोक कुमार अग्रवाल के खिलाफ तड़के की गई एक छापेमारी से जुड़ा है। कोर्ट ने इसे न्यायिक आदेशों को दरकिनार करने की एक बदनीयत कोशिश बताया। दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट ने सीबीआई के जॉइंट डायरेक्टर रामनीश और दिल्ली पुलिस के एक रिटायर्ड असिस्टेंट कमिश्नर वीके पांडे को मारपीट, आपराधिक घुसपैठ और शरारत के एक मामले में दोषी ठहराया। यह मामला साल 2000 में किए गए अपराध से जुड़ा है।
प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट शशांक नंदन भट्ट ने रामनीश (वर्तमान में सीबीआई में संयुक्त निदेशक के पद पर कार्यरत हैं) और वीके पांडे (दिल्ली पुलिस के रिटायर्ड एसीपी) को भारतीय दंड संहिता की धारा 323, 427, 448 और 34 के तहत हमला, आपराधिक घुसपैठ और शरारत करने के अपराध में दोषी ठहराया है। रामनीश साल 2000 में सीबीआई में पुलिस उपाधीक्षक और वीके पांडे सीबीआई में इंस्पेक्टर के पद पर तैनात थे। कोर्ट ने सजा पर दलीलें सुनने के लिए इस मामले को 27 अप्रैल को सूचीबद्ध किया है।
शिकायतकर्ता अशोक कुमार अग्रवाल 1985 बैच के आईआरएस अधिकारी हैं। उस समय वह ईडी में दिल्ली जोन के उप निदेशक के पद पर कार्यरत थे। कोर्ट ने उनके खिलाफ चल रहे सीबीआई के दोनों मामलों से बरी कर दिया। आरोपियों को दोषी ठहराते हुए कोर्ट ने माना कि 19 अक्तूबर 2000 को की गई तलाशी और गिरफ्तारी की कार्रवाई दुर्भावनापूर्ण तरीके से की गई थी। इसका एकमात्र उद्देश्य 28 सितंबर 2000 के कैट के उस आदेश को निष्प्रभावी करना था, जिसमें शिकायतकर्ता के ‘मानित निलंबन’ (डीम्ड सस्पेंशन) की चार सप्ताह के भीतर समीक्षा करने का निर्देश दिया गया था।
कोर्ट ने यह भी माना कि आरोपियों ने कानून द्वारा उन्हें प्रदत्त शक्तियों का घोर उल्लंघन किया। उनके कृत्य सरकारी कर्तव्य के निर्वहन के दायरे में नहीं आते हैं। इसलिए वे सीआरपीसी की धारा 197 या दिल्ली पुलिस अधिनियम की धारा 140 के तहत मिलने वाली सुरक्षा के हकदार नहीं हैं। कोर्ट ने पाया कि आरोपी ने शिकायतकर्ता के घर का मुख्य स्लाइडिंग दरवाजा तोड़ दिया था जो कि नुकसान पहुंचाने और आपराधिक घुसपैठ का मामला बनता है। इस बात की पुष्टि तो आरोपी द्वारा दिल्ली हाई कोर्ट में पेश की गई अपनी खुद की सर्च लिस्ट से भी होती है। छापेमारी के दौरान शिकायतकर्ता के दाहिने हाथ में चोट लगी थी। इस बात की पुष्टि प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही, शिकायतकर्ता की एमएलसी रिपोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट में आरोपी वीके पांडे द्वारा दायर किए गए जवाबी हलफनामे से भी होती है।
कोर्ट ने यह भी पाया कि कैट के निर्देशानुसार 18 अक्तूबर 2000 तक इनकम टैक्स विजिलेंस डायरेक्टोरेट को जरूरी जवाब भेजने के बजाय सीबीआई अधिकारी ने 18 अक्टूबर 2000 की शाम को एक गुप्त बैठक की और ठीक अगली सुबह ही शिकायतकर्ता के घर पर छापा मारने और उसे गिरफ्तार करने का फैसला कर लिया।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया की मजबूती और पारदर्शिता को दर्शाता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि चाहे पद कितना भी ऊँचा क्यों न हो, कानून के शिकंजे से कोई बच नहीं सकता। इस निर्णय से पीड़ित पक्ष को न्याय मिला है और समाज में यह संदेश गया है कि न्याय में देर हो सकती है, लेकिन अंधेर नहीं।




