चीन बॉर्डर पर पुराना पुल बन गया शानदार कैफे, 1962 के युद्ध में सैनिक करते थे गश्त

नेशनल डेस्क। अरुणाचल प्रदेश के तवांग जिले में जेमिथांग गांव के न्यामजांग चु नदी पर 1962 के भारत-चीन युद्ध का एक पुराना बैली पुल अब आधुनिक ‘बॉर्डर ब्रू कैफे’ में बदल गया है। यह पुल पहले सैनिकों की आवाजाही के लिए इस्तेमाल होता था।
अब इसे अपसाइकल करके पर्यटकों के लिए बना दिया गया है। यह जगह चीन सीमा से महज 20 किलोमीटर दूर है और समुद्र तल से 7000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। जहां कभी सैनिकों के काफिले हुआ करते थे, वहां अब कॉफी की भाप निकलती और चाय उबलती है। साल 1962 के युद्ध के इस स्मारक पर, जहां से सैनिकों को पूर्वोत्तर के सुदूर छोर पर अनिश्चितता की ओर ले जाया गया था, अब आगंतुक रुककर बाहर का नाजर देखते हैं। यह अतीत और वर्तमान के बीच एक सेतु है।
सेना के गजराज कोर ने ‘ऑपरेशन सद्भावना’ के तहत मात्र 31 दिनों में यह पुल बनाया था। पुराने पुल को हटाकर नया पुल बनने के बाद पुराने ढांचे को कैफे में बदल दिया गया। ऊपर ग्लासी विस्टाडोम लगाया गया, जिससे हिमालय की बर्फीली चोटियों और नदी का मनमोहक नजारा दिखता है। अंदर ‘वॉल ऑफ वैलर’ बनाई गई है, जिसमें 1962 के युद्ध में शहीद सैनिकों की तस्वीर और नाम हैं। इस कैफे में दो मैनिकिन्स रखे गए हैं जो पुराने और नए सैनिक वर्दी की तुलना दिखाते हैं।
स्थानीय मोनपा महिलाएं कैफे का संचालन करती हैं
यह कैफे सिर्फ चाय-कॉफी की जगह नहीं, बल्कि एक छोटा म्यूजियम भी है। साल 1959 में जब 14वें दलाई लामा तिब्बत से भागकर भारत में दाखिल हुए थे, तब ज़ेमिथंग ही उनका प्रवेश द्वार था। यही वह बिंदु था जिसने तीन साल बाद युद्ध में तब्दील हुए तनाव की शुरुआत की। स्थानीय मोनपा जनजाति की महिलाएं कैफे चलाती हैं। यहां कॉफी, चाय, सैंडविच, मोमो और पारंपरिक ‘सुजा’ (बटर टी) मिलती है। परियोजना की लागत करीब 80 लाख रुपये है। यह पहल सीमा क्षेत्र में पर्यटन बढ़ाने और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में एक अनोखा कदम है। जहां कभी सैनिकों के जूतों की आवाज गूंजती थी, वहां अब चाय की प्यालियों की खनक सुनाई देती है।

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