बाड़मेर में जमीन से निकल रहा क्रूड ऑयल, 55 से ज्यादा टैंकर भर चुके, ब्लास्ट से आईं दरारें

बाड़मेर/राजस्थान। बाड़मेर के कवासा क्षेत्र में पिछले पांच दिन से हो रहे क्रूड ऑयल रिसाव शुक्रवार को खत्म हो गया। यहां खेत में हो रहे क्रूड ऑयल रिसाव के स्रोत का पता अभी नहीं लगा है। उल्लेखनीय है कि खेत में हो रहे रिसाव के बाद तेल उत्पादक कंपनी ने ऐश्वर्या वेलपेड-8 से जुड़े सभी 20 कुओं को पूरी तरह बंद कर दिया था। इस कार्रवाई के कारण कंपनी को प्रतिदिन लगभग 5,000 बैरल तेल उत्पादन का नुकसान उठाना पड़ रहा है। लेकिन फिर भी यह जानकारी नहीं मिली है कि आखिर क्रूड ऑयल का रिसाव कहां से हो रहा है।
लीकेज वाले स्थान को सुरक्षित करने के लिए कंपनी ने इस क्षेत्र को सीज कर दिया है। यहां बड़ी मात्रा में सुरक्षा कर्मी भी मौजूद हैं। घेराबंदी कर दी गई है और वहां टीनशेड लगा दिए हैं। आम लोगों की आवाजाही पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है। कंपनी के मीडिया मैनेजर मुकेश मथराणी के अनुसार, सभी पाइपलाइन बंद किए जाने के बाद रिसाव रुक गया है। अब तकनीकी टीम एक-एक करके सभी पाइपलाइन सेक्शन की जांच करेगी, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि लीकेज किस कुएं या पाइपलाइन से हुआ था।
इस घटना को लेकर ग्रामीणों और कंपनी के बीच मतभेद नजर आ रहे हैं। यहां ग्रामीणों का कहना है कि 24 फरवरी की रात यहां तेज धमाके (ब्लास्ट) हुए थे। इधर, कंपनी के अधिकारियों ने इसे सिरे से नकार दिया है। कंपनी का दावा है कि उस रात 11:25 बजे 3.2 तीव्रता का भूकंप आया था, जिसका विवरण ‘राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र’ की वेबसाइट पर भी दर्ज है। कंपनी के अनुसार, भूकंप का केंद्र तेल क्षेत्र से दूर और सतह से 5 किलोमीटर नीचे था, जबकि यहां ड्रिलिंग केवल 2 किलोमीटर गहराई तक ही की जाती है। कंपनी ने ग्रामीणों की बात को खारिज करते हुए कही भी ब्लास्ट ना होने की बात कही है।
खेत के मालिक हरजीराम खोथ ने बताया कि 23 फरवरी को उनके 2-3 बीघा खेत में अचानक काला तेल फैलने लगा। सूचना मिलने पर कंपनी ने जेसीबी से 100 मीटर लंबी खाई और गड्ढा खुदवाया ताकि तेल सड़क तक न पहुंचे। पिछले 5 दिनों में वैक्यूम टैंकरों के जरिए करीब 60 से ज्यादा टैंकर क्रूड ऑयल मौके से हटाया जा चुका है। वर्तमान में फैले हुए तेल पर मिट्टी डालकर उसे ढका गया है। किसान का कहना है कि इस घटना से उन्हें काफी नुकसान हुआ है। किसान का यह भी कहना है कि आने वाले 50 सालों तक इस भूमि पर खेती करना मुश्किल होगा।

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