लखनऊ में 69 हजार शिक्षक भर्ती अभ्यर्थियों का प्रदर्शन, डेप्युटी सीएम आवास घेरने की कोशिश

लखनऊ/एजेंसी। उत्तर प्रदेश में 69 हजार शिक्षक भर्ती के आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों का प्रदर्शन तूल पकड़ता जा रहा है। अभ्यर्थियों ने अपनी मांगों को लेकर एक बार फिर उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के सरकारी आवास का घेराव किया है। अभ्यर्थी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई ना होने से बेहद नाराज है। अभ्यर्थियों के प्रदर्शन की वजह से मौके पर भारी संख्या में पुलिस फोर्स तैनात रही। प्रदर्शन करने पहुंचे अभ्यर्थियों ने ‘केशव चाचा न्याय करो’ का जोरदार नारा लगाते हुए धरते पर बैठ गए थे। वहीं मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों ने सभी अभ्यर्थियों को बस में भरकर धरना स्थल ईको गार्डन भेज दिया है।
प्रदर्शनकारी अभ्यर्थियों ने बताया कि हाईकोर्ट का जो फैसला आया था, सरकार ने उसे जानबूझ कर लटका दिया है। जिससे यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। सरकार के पास पर्याप्त समय था, वह हाईकोर्ट डबल बेंच के फैसले का पालन करके सबके साथ न्याय कर सकती थी। अभ्यर्थी अमरेंद्र पटेल ने बताया कि साल 2018 में यह भर्ती प्रक्रिया शुरू हुई थी। जब इसका परिणाम आया तो इसमें व्यापक स्तर पर आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों के साथ अन्याय किया गया और उन्हें नौकरी देने से वंचित कर दिया गया था।उन्होंने बताया कि एक लंबे आंदोलन और न्यायिक प्रक्रिया से गुजरने के बाद बीते 13 अगस्त 2024 को लखनऊ हाई कोर्ट के डबल बेंच ने आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों के हित में फैसला सुनाया था। साथ ही नियमों का पालन करते हुए अभ्यर्थियों को नियुक्ति दिए जाने का आदेश भी दे दिया था। लेकिन सरकार इस प्रकरण में हीला हवाली करती रही। उधर प्रदर्शन कर रहे अभ्यर्थियों का कहना है कि उन्होंने दो सितंबर को भी उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के आवास का घेराव किया था। तब उपमुख्यमंत्री ने त्वरित न्याय किए जाने की बात कही थी और अभ्यर्थियों से मुलाकात भी की थी।
अभ्यर्थियों का आरोप है कि उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के आश्वासन के बाद अधिकारियों ने उनकी बात को नहीं माना है। अब यह मामला माननीय सुप्रीम कोर्ट में चला गया है। साथ ही अभ्यर्थियों का कहना है कि हम पिछड़े, दलित और गरीब अभ्यर्थी अधिकारियों और सरकार के इस रवैया से काफी हताश और परेशान हैं। जो काम कुछ दिनों में हो सकता था, उसे इतना लंबा जानबूझकर टाल दिया गया है। केशव प्रसाद मौर्य का त्वरित न्याय की टिप्पणी, खाने के दांत अलग और दिखाने के दांत अलग साबित हुआ है। त्वरित न्याय की कोई सीमा होती है, यह नहीं कि महीनों मामला लटका रहे।




