जयरामपुर गुरगौला में अमृत सरोवर तालाब पर जांच, ग्रामीणों ने उठाए सवाल
मनरेगा का बदला नाम, मगर नहीं बदली नियत

फतेहपुर/उत्तर प्रदेश। ग्रामीण विकास की सबसे बड़ी योजनाओं में से एक मनरेगा को सरकार ने समय-समय पर नए नाम और नए स्वरूप देने की कोशिश की है। कभी इसे अमृत सरोवर योजना से जोड़ा गया, कभी रोजगार गारंटी के साथ विकास कार्यों का चेहरा बदलने की बात कही गई। मनरेगा का नाम बदलकर ‘VB-G RAM G’ (विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन ग्रामीण) या ‘पूज्य बापू ग्रामीण रोजगार गारंटी’ किए जाने के बाद यह दावा किया जा रहा है कि कानूनी गारंटी के स्थान पर अब इसे ‘सरकार की कृपा’ के रूप में बदला जा रहा है। हालांकि, सरकार इसे बेहतर पारदर्शिता, अधिक कार्य दिवस (100 से 125) और आजीविका बढ़ाने के प्रयास के रूप में प्रस्तुत कर रही है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि नाम बदलने से नीयत नहीं बदलती। गांवों में आज भी वही पुरानी शिकायतें सुनाई देती हैं—काम अधूरा छोड़ दिया गया, तालाब की खुदाई कागजों में पूरी दिखा दी गई, नाली और चबूतरे का निर्माण केवल दिखावे के लिए किया गया। योजनाओं के नाम चाहे कितने भी आकर्षक रखे जाएं, अगर क्रियान्वयन में पारदर्शिता और ईमानदारी नहीं है तो ग्रामीणों को वास्तविक लाभ नहीं मिल पाता।
ऐसा ही एक मामला यूपी के फतेहपुर जिले से आया है जहाँ खखरेरु क्षेत्र के जयरामपुर गुरगौला गांव में विकास कार्यों को लेकर ग्रामवासियों ने वर्तमान ग्राम प्रधान के खिलाफ गंभीर शिकायतें दर्ज कराई हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि अमृत सरोवर तालाब के सुंदरीकरण कार्य में प्रधान ने लापरवाही बरती है।
जिले की मनरेगा टीम गुरुवार को गांव पहुंची और तालाब का निरीक्षण किया। जांच के दौरान ग्रामीणों ने बताया कि वर्ष 2006-2007 में तालाब की खुदाई और सुंदरीकरण का कार्य तत्कालीन प्रधान उमा देवी द्वारा कराया गया था। वर्तमान प्रधान ने केवल तालाब किनारे चबूतरे का निर्माण कराया है। ग्रामीणों का कहना है कि प्रधान ने जेसीबी मशीन से तालाब में कार्य शुरू कराया था, लेकिन विरोध के बाद काम रुकवा दिया गया और तब से कोई कार्य आगे नहीं बढ़ा।
जांच टीम में लोकपाल मनरेगा राजबहादुर यादव, जेई एमआई शिव बहादुर सिंह और अशीष शर्मा मौजूद रहे। टीम से पूछताछ में यह स्पष्ट हुआ कि वर्तमान प्रधान ने न तो अमृत सरोवर का सुंदरीकरण कराया और न ही नाली का निर्माण किया। जांच रिपोर्ट उच्च अधिकारियों को भेजी जाएगी, जिसके आधार पर आगे की कार्रवाई तय होगी।
ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों से तालाब की स्थिति जस की तस बनी हुई है और विकास कार्यों का लाभ उन्हें नहीं मिल पा रहा। अब देखना होगा कि जांच रिपोर्ट के बाद प्रशासनिक स्तर पर क्या कदम उठाए जाते हैं।
मनरेगा का मूल उद्देश्य था कि ग्रामीणों को रोजगार मिले और गांवों का बुनियादी ढांचा मजबूत हो। लेकिन कई जगह यह योजना केवल ठेकेदारों और प्रधानों के लिए लाभ का साधन बन गई है। जांच टीमें जब भी गांवों में पहुंचती हैं तो ग्रामीणों की आवाज यही होती है कि काम कागजों में हुआ है, जमीन पर नहीं।
यह स्थिति बताती है कि समस्या नाम या योजना की संरचना में नहीं, बल्कि नीयत और कार्यशैली में है। जब तक जिम्मेदार अधिकारी और जनप्रतिनिधि ईमानदारी से काम नहीं करेंगे, तब तक मनरेगा जैसी योजनाएं केवल घोषणाओं और बोर्डों तक सीमित रहेंगी। गांव के लोग आज भी उम्मीद लगाए बैठे हैं कि कभी तो यह योजना अपने असली मकसद को पूरा करेगी—रोजगार, विकास और पारदर्शिता। लेकिन फिलहाल यह कहावत ही सच लगती है: मनरेगा का नाम बदला मगर नहीं बदली नियत।





