प्लास्टिक, टॉयर-ट्यूब और फटी जींस,कबाड़ को खूबसूरत कारोबार में बदल बनाई पहचान

  • नोएडा में रहने वालीं अनीता आहूजा अपने अनोखे काम से मशहूर
  • कबाड़ से सजावटी उत्‍पाद बनाकर दे रहीं कई महिलाओं को रोजगार
  • यूपी से लेकर हरियाणा के आठ जिलों की महिलाएं कारोबार में शामिल

नोएडा ब्यूरो। आमतौर पर घर हो या दुकान, पुरानी वस्तुओं और स्क्रैप को हम बेकार समझकर फेंक देते हैं। मगर यही स्क्रैप जब आपके घर की शोभा बढ़ाए और पैसे दिलाए तो बात ही कुछ और होगी। स्क्रैप से ऐसा ही कारोबार खड़ा कर शहर निवासी अनीता आहूजा ने देश-विदेश में पहचान बनाई है। अनीता यूपी के साथ हरियाणा के आठ जिलों की 300 महिलाओं को अपने साथ जोड़कर स्क्रैप से क्रिएशन का कार्य कर रही हैं। वे बेकार प्लास्टिक, टायर-टयूब से लेकर फटे-पुराने जींस आदि से बैग, वॉलेट, पेपर वेट, पर्स समेत 65 ज्यादा उत्पाद बना रही हैं।

इंडिया एक्स्पो सेंटर में चल रहे दुनिया के सबसे बड़े हस्तशिल्प के मेले में उनके स्टॉल पर पांच दिन के तीन सौ से ज्यादा विदेशी कारोबारी पहुंचे हैं। अनीता ने बताया कि 20 साल से सेल्फ हेल्प ग्रुप चलाने के साथ कुछ नया करने के बारे में सोचती रहती थी। वे बताती हैं कि अकसर वह दिल्ली हो या नोएडा अक्सर कूड़े का पहाड़ देखकर उनके दिमाग में कुछ अलग करने का विचार आता था। उन्होंने पहले जब बेकार वस्तुओं को एकत्रित कर उनको उत्पाद के रूप में बाजार में उतारा तो लोग हिचकिचाते थे। अब इन उत्पादों को हाथों-हाथ ले रहे हैं। आज देश ही नहीं विदेशों में उनका कारोबार फल-फूल रहा है। अनीता ने बताया कि उनके उत्पाद अमेरिका, यूरोप, जापान आदि देशों में निर्यात होता है।

हस्तशिल्प मेला इंडिया एक्स्पोमार्ट में बोनाफाइड एक्सपोर्ट के नाम से स्टाल लगाए राजस्थान के रहने वाले वीरेन्द्र जैन भी पुरानी लकड़ी, सामान, बोतलों आदि से उपयोगी उत्पाद बना रहे हैं। उन्होंने बताया कि हम वही सामान गांवों व कस्बों से लेते हैं, जिसे लोग जलाना या फेंकना चाहता है। हमने ईंट बनाने के सांचे, पुरानी बोतलें, बैलगाड़ी के चक्के, पुराने दरवाजे, खिड़कियां आदि को एकत्रित कर उपयोगी उत्पाद बनवाते हैं और लोगों को रोजगार भी देते हैं। पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए विश्व के लगभग सभी देशों में लकड़ी काटने पर पाबंदी है, जिससे वुडन उत्पाद बनने कम हो गए हैं। 50 से 100 वर्ष पुरानी लकड़ी की बने अलमारी, टेबल, कुर्सी, चौकी, फोटो फ्रेम वगैरह लोग ज्यादा लेना चाहते हैं। वैसी लकड़ी न मिलने पर इनकी जगह एमडीएफ का इस्तेमाल हो रहा है।

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