सिर कटे गजानन की उत्तराखंड के मंदिर में होती है पूजा, यहां आसानी से नहीं पहुंच सकता हर कोई

देहरादून/एजेंसी। उत्तराखंड में ऐसा मंदिर स्थित है, जहां बिना सिर वाले गणेश भगवान की पूजा होती है। यह रहस्यमई मंदिर रुद्रप्रयाग जिले में स्थित है, जो सोनप्रयाग से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर बना हुआ है। केदार घाटी में बना ये मंदिर विश्व में इकलौता ऐसा मंदिर है, जहां बिना सिर वाले गणेश भगवान की मूर्ति स्थापित है। देशभर में इन दिनों गणेश उत्सव चल रहा है। महाराष्ट्र के साथ-साथ पूरे देश में गणपति का यह उत्सव धूमधाम से मनाया जा रहा है। देवभूमि उत्तराखंड में भी जगह-जगह भगवान गणेश की प्रतिमाएं स्थापित कर पंडालों में उनकी धूमधाम से पूजा की जा रही है।
देवभूमि में भगवान गणेश के कई ऐसे मंदिर हैं जो धार्मिक महत्व रखने के साथ ही कई रहस्यों को भी समेटे हुए हैं। विशेष अवसरों पर इन मंदिरों में भारी संख्या में श्रद्धालु जुटते हैं। विघ्नहर्ता का एक ऐसा ही मंदिर उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित है, जहां गणपति की बिना सिर वाली प्रतिमा स्थापित है। देवभूमि में इस मंदिर को मुंडकटिया नाम से जाना हैं। इसका मतलब है, सिर कटा हुआ। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जब माता पार्वती स्नान के लिए जा रही थीं, तब उन्होंने उबटन से गणेश भगवान की उत्पत्ति की और उनको भवन के बाहर खड़े रहने के लिए कहा। माता पार्वती ने उन्हें निर्देश दिया कि कोई भी अंदर नहीं आना चाहिए। जब भगवान गणेश द्वार पर खड़े थे तो कुछ देर बाद ही भगवान शिव वहां पहुंचे और सीधा अंदर जाने लगे। इस पर गणेश जी में उनको अंदर जाने से रोक दिया। भगवान गणेश नहीं जानते थे कि भोले शंकर कौन है और उन्होंने शिव को अंदर नहीं जाने दिया।
शिव भगवान शिव क्रोधित हो गए और उन्होंने गुस्से में आकर गणपति का सिर धड़ से अलग कर दिया। भगवान गणेश का सिर जहां गिरा वहीं पर गणपति की पूजा होने लगी। जब मां पार्वती ने गणेश का कटा हुआ शरीर देखा तो वह दुखी हो गईं और भगवान शिव से उसको जीवित करने के लिए आग्रह करने लगी। तब शिव ने शिशु हाथी का सिर लगाकर गणेश को पुनर्जीवित कर दिया था। इसके बाद से वह गजानन कहलाए जाने लगे।
डकटिया मंदिर पहुंचने में कई बाधाएं
भगवान केदारनाथ के दर्शन के लिए जाते समय गौरीकुंड के पास मुंडकटिया मंदिर पड़ता है। हालांकि यहां पर कम ही लोग दर्शन करने आते हैं। क्योंकि यह मंदिर आम जनता से काफी दूरी पर स्थित है। गौरीकुंड में मां गौरी ने तपस्या की थी और गौरीकुंड के पास स्थित त्रियुगीनारायण मंदिर में शिव पार्वती का विवाह हुआ था। गौरीकुंड में जहां गर्म झरने हैं, उन्हें स्नान स्थलों में बदल दिया गया है। वर्ष 2013 की आपदा ने जहां केदार घाटी को तबाह कर दिया था। वहीं सोनप्रयाग से आगे कई भूस्खलन क्षेत्र भी है, जिसकी वजह से मुंडकटिया मंदिर तक पहुंचने में बाधाएं आ रही हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार आपदा से पहले इस मुंडकटिया मंदिर में प्रतिवर्ष हजारों श्रद्धालु आते थे, लेकिन अब सड़क जैसी सुविधाओं के अभाव में पर्यटकों और श्रद्धालुओं का आना कम हो गया है। अन्य तीर्थ स्थलों के समान ही यह एक विशेषता वाला मंदिर है। इसलिए यहां पर भी सुविधाएं विकसित करने के लिए सरकार को विचार करना चाहिए।

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