गंभीर स्थिति में लाए गए अंधे तेंदुए इंदर ने भोपाल के वन विहार राष्ट्रीय उद्यान में एक नई जिंदगी की प्रारंभ

भोपाल/मध्य प्रदेश। इंदौर के कमला नेहरू संग्रहालय से गंभीर हालत में भोपाल लाए गए अंधे तेंदुए ‘इंदर’ की कहानी अपने आप में संघर्ष को समेटे हुए है। सिर में 35-40 छर्रे धंसे होने और आंखों की रोशनी पूरी तरह खत्म हो जाने के बावजूद, इंदर आज पूरी तरह स्वस्थ और सक्रिय है। यह अपने आप में एक मिसाल है। यह तेंदुआ सितंबर 2020 में गंभीर हालत में भोपाल लाया गया था। उस समय वन्यजीव विशेषज्ञों को भी उसके जीवित बचने की उम्मीद कम थी। लेकिन छह साल बाद, इंदर न केवल सक्रिय है, बल्कि अपने पूरे आवास और बाहरी जगहों को सूंघकर पहचानने लगा है।
वन परिक्षेत्र इंदौर के ग्राम नयापुरा (कक्ष क्रमांक 222) में यह तेंदुआ अत्यंत गंभीर स्थिति में मिला था। उसके सिर में 35-40 छर्रे धंसे हुए थे और शरीर से खून बह रहा था। उसकी आंखों की रोशनी पूरी तरह खत्म हो चुकी थी। 21 सितंबर 2020 को भोपाल स्थित पशु चिकित्सालय में सीटी स्कैन के लिए लाए जाने पर पता चला कि छर्रे दिमाग के बेहद संवेदनशील हिस्सों के पास होने के कारण ऑपरेशन संभव नहीं था। डॉक्टरों ने कहा कि यह तेंदुआ डिप्रेशन में था और लगभग मौत की कगार पर पहुंच चुका था।
तत्कालीन डॉयरेक्टर कमलिका महोलता और वरिष्ठ पशु चिकित्सक डॉ. अतुल गुप्ता ने इसे वन विहार में क्वारंटाइन में रखा। इसका उद्देश्य उसे डिप्रेशन और शारीरिक जटिलताओं से बाहर निकालना था। टीम ने इंदर के मन को शांत करने के लिए कई अनोखे प्रयोग किए। उसे मधुर संगीत सुनवाया गया। बाड़े में अलग-अलग स्थानों पर खाना रखकर उसकी सूंघने की शक्ति को सक्रिय कराया गया। मानव उपस्थिति कम रखी गई ताकि उसका तनाव न बढ़े।
धीरे-धीरे उसे व्यावहारिक गतिविधियों से परिचित कराया गया, जो शुरू में मुश्किल था। इंदर डर जाता था और खाना नहीं खाता था। वह कोने में दुबककर बैठा रहता था। लेकिन टीम ने हार नहीं मानी। जब उसकी मानसिक स्थिति थोड़ी स्थिर हुई, तब उसे हाउसिंग एरिया में शिफ्ट किया गया। यहां शर्मानंद गेरे और दिलीप बाथम ने उसकी पूरी देखरेख की।
अंधे होने के कारण सबसे बड़ी चुनौती उसे अपने नए घर का नक्शा ‘महसूस’ कराना थी। इसलिए बाड़े में जगह-जगह खाना रखा जाता था और खाने की जगह रोज बदल दी जाती थी। ऊंचाई पर भी भोजन रखा जाता था, क्योंकि तेंदुए प्राकृतिक रूप से ऊंचे स्थान पसंद करते हैं। उसके चलने के मार्ग खुले छोड़े गए, ताकि वह स्वतंत्र महसूस कर सके। दो महीने में वह अपने हाउसिंग का पूरा नक्शा सूंघकर समझ गया। छह महीने बाद इंदर पूरी तरह अपने वातावरण में सहज हो चुका था। वन विहार में इंदर अन्य तेंदुओं की तरह सक्रिय है। वह बाड़े से बाहर की आवाजें पहचानता है। ऊंचाई पर बैठना पसंद करता है और हर गतिविधि कुशलता से करता है।

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