जम्मू और श्रीनगर के लिए मेट्रो प्रोजेक्ट का सर्वे पूरा, केंद्र को भेजी डीपीआर,कॉरिडोर में होंगे 22 स्टेशन

कैप्शन: फोटो प्रतीकात्मक है, जिसे एआई द्वारा बनाया गया है
जम्मू/एजेंसी। राजधानी जम्मू और श्रीनगर में मेट्रोलाइट और लाइट मेट्रो परियोजनाओं की डीपीआर तैयार करके केंद्र सरकार को भेजी गई है। जम्मू के लिए मेट्रो लाइट परियोजना के तहत व्यापक भूमि सर्वेक्षण, यातायात अध्ययन, व्यवहार्यता विश्लेषण और डीपीआर (विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट) की तैयारी मैसर्स राइटस लिमिटेड के माध्यम से पूरी की गई है। हालांकि, इस परियोजना को बनतालाब से आगे अखनूर तक ले जाने का कोई प्रस्ताव नहीं है। समाज कल्याण मंत्री सकीना इट्टू ने मंगलवार को विधानसभा में प्रश्नकाल के दौरान अखनूर के विधायक मोहन लाल के एक प्रश्न के जवाब में यह जानकारी दी।
मंत्री ने कहा कि दोनों राजधानी शहरों जम्मू और श्रीनगर में परिवहन ढांचे के विस्तार के लिए मेट्रो लाइट और लाइट मेट्रो परियोजना का प्रस्ताव तैयार किया गया है। जम्मू के लिए मेट्रोलाइट परियोजना की डीपीआर में मार्ग निर्धारण, यात्रियों की संख्या का अनुमान (2035 तक दैनिक 2.84 लाख यात्री), लागत अनुमान, भूमि आवश्यकताएं (29.58 हेक्टेयर स्थायी और 1.50 हेक्टेयर अस्थायी), पर्यावरण और भूकंपीय डिजाइन सहित वित्तीय संरचना शामिल है।
परियोजना की आंतरिक आर्थिक दर 18.92 प्रतिशत आंकी गई है। वर्तमान प्रस्ताव जम्मू शहरी कारिडोर तक सीमित है, जो बनतालाब से बाड़ी ब्रह्मणा तक 23 किमी. लंबा होगा और इसमें 22 स्टेशन होंगे। फिलहाल मेट्रोलाइट कॉरिडोर को अखनूर शहर तक बढ़ाने का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है और किसी भी भविष्य की विस्तार योजना के लिए अलग से व्यवहार्यता अध्ययन और भारत सरकार की मंजूरी आवश्यक होगी।
श्रीनगर शहर के संबंध में मंत्री ने कहा कि विस्तृत स्थलाकृतिक सर्वेक्षण, यातायात और यात्रियों की संख्या का आकलन, इंजीनियरिंग व्यवहार्यता अध्ययन, वित्तीय और आर्थिक विश्लेषण और मार्ग निर्धारण मैसर्स राइटस लिमिटेड द्वारा किया गया है। केंद्र सरकार अगर डीपीआर मंजूर करती है तो ही इन परियोजनाओं पर आगे काम बढ़ेगा। फिलहाल, हम केंद्र की मंजूरी का इंतजार कर रहे हैं।
बता दें कि मेट्रोलाइट और लाइट मेट्रो भारत में कम यात्री क्षमता वाले शहरों के लिए कम लागत वाली, हाई-स्पीड फीडर-आधारित रेल प्रणालियां हैं। मेट्रोलाइट सड़क के स्तर पर फेंसिंग के साथ ₹100-140 करोड़/किमी की लागत में बनती है, जो पारंपरिक मेट्रो से 40 प्रतिशत कम होता है।




