साढ़े तीन सौ साल पुराना मां आशापुरी मंदिर, जहां नवरात्र में महिलाओं के प्रवेश पर रोक, पौराणिक मान्यता से जुड़ी है कहानी
शारदीय नवरात्र से पहले बिहार के नालंदा का एक मंदिर चर्चा में बना हुआ है। इस मंदिर की कहानी पौराणिक है। स्थानीय लोग बताते हैं कि मंदिर से जुड़ी बहुत ही अद्भुत कहानी है। इस मंदिर में नवरात्र में महिलाओं के प्रवेश पर रोक रहता है। आइए जानते हैं, क्या है इस मंदिर का रहस्य और उसकी कहानी।

नालंदा,बिहार। गिरियक प्रखंड के घोसरावां गांव स्थित मां आशापुरी मंदिर नालंदा के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल है। करीब साढ़े तीन शताब्दी पुराने इस मंदिर में मां आशापुरी सिद्धिदात्री स्वरूप में विराजमान हैं। आठ भुजाओं वाली मां की दिव्य प्रतिमा श्रद्धालुओं के आकर्षण का प्रमुख केंद्र है। सामान्य दिनों में भी यहां भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं, जबकि नवरात्र के दौरान मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ जाती है।
बिहारशरीफ से करीब 16 किलोमीटर और पावापुरी जल मंदिर से लगभग चार किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह मंदिर अपनी विशिष्ट पूजा-पद्धति और स्थानीय धार्मिक मान्यताओं के लिए जाना जाता है। स्थानीय लोगों के अनुसार, वर्षों पहले गांव के एक टीले पर मां की प्रतिमा प्रकट हुई थी, जिसके बाद यहां मंदिर का निर्माण कराया गया। समय के साथ यह स्थान शक्ति उपासना और मनोकामना पूर्ति के लिए श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बन गया।
मंदिर के पुजारी पंडित पुरेंद्र उपाध्याय के अनुसार, शारदीय नवरात्र के दौरान मां आशापुरी की विशेष पूजा तांत्रिक विधि से की जाती है। इस अवधि में नौ दिनों तक मंदिर परिसर और गर्भगृह में महिलाओं के प्रवेश को लेकर स्थानीय धार्मिक परंपरा के अनुसार रोक रहती है। वहीं चैत्र नवरात्र में महिलाएं मंदिर परिसर में प्रवेश कर मां के दर्शन और पूजा-अर्चना कर सकती हैं, हालांकि नौ दिनों तक गर्भगृह में प्रवेश की अनुमति नहीं रहती।
मंदिर समिति के अध्यक्ष लालकेश्वर सिंह और सचिव सुशील उपाध्याय के अनुसार, मां आशापुरी का दरबार स्थानीय श्रद्धालुओं के बीच ‘मन्नतों का दरबार’ के रूप में प्रसिद्ध है। लोग सुख-शांति, संतान, स्वास्थ्य और अन्य मनोकामनाओं के लिए यहां पूजा-अर्चना करते हैं। मन्नत पूरी होने के बाद कई श्रद्धालु दोबारा मंदिर पहुंचकर मां के प्रति आभार व्यक्त करते हैं।
नवरात्र के अवसर पर मंदिर को फूलों, ध्वज-पताकाओं और रंग-बिरंगी रोशनी से सजाया जाता है। सुबह की पूजा से लेकर शाम की आरती तक मंदिर परिसर मंत्रोच्चार, घंटा-घड़ियाल और जयकारों से गूंजता रहता है। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने के कारण इस दौरान पूजा और भीड़ प्रबंधन की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
आठ भुजाओं वाली मां आशापुरी की प्रतिमा को श्रद्धालु शक्ति, सिद्धि और रक्षा का प्रतीक मानते हैं। सदियों पुरानी धार्मिक परंपराओं और लोकविश्वास को संजोए घोसरावां का यह मंदिर आज भी नालंदा में आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है।




