नरक चतुर्दशी पर 14 दीपक जलाने की है परंपरा, यम और पितरों के निमित्त दीपदान का विशेष महत्व
नरक चतुर्दशी पर यमराज और पितरों के लिए दीपक जलाने का महत्व है। यह पर्व अकाल मृत्यु के भय को दूर करता है और पितृ दोष से मुक्ति दिलाता है, जिसमें 14 दीपक विभिन्न स्थानों पर जलाए जाते हैं।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। दीपावली से एक दिन पहले मनाई जाने वाली नरक चतुर्दशी को छोटी दीपावली और रूप चौदस के नाम से भी जाना जाता है। सनातन परंपरा में इस दिन का विशेष धार्मिक महत्व है। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इसी दिन नरकासुर नामक राक्षस का वध कर उसके अत्याचारों से लोगों को मुक्ति दिलाई थी। यह पर्व बुराई पर अच्छाई, अंधकार पर प्रकाश और अशुद्धता पर शुद्धता की विजय का प्रतीक माना जाता है। इस दिन दीपक जलाने के साथ भगवान यम और पितरों के निमित्त दीपदान करने की परंपरा भी प्रचलित है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नरक चतुर्दशी पर यमराज के नाम से चौमुखी दीपक जलाने का विशेष विधान है। मान्यता है कि इससे अकाल मृत्यु का भय दूर होता है और परिवार की सुख-समृद्धि तथा सुरक्षा की कामना पूरी होती है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर 14 दीपक जलाने की परंपरा भी बताई गई है। स्कंद पुराण सहित विभिन्न धार्मिक मान्यताओं में इस दिन यमराज के सम्मान में दीप प्रज्वलित करने का उल्लेख मिलता है। हालांकि, दीपदान की विधि और संख्या को लेकर अलग-अलग क्षेत्रों में परंपराएं भिन्न हो सकती हैं।
नरक चतुर्दशी पर पितरों के नाम से दीपक जलाने का भी विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, घर की दक्षिण दिशा को यमराज और पितरों से संबंधित दिशा माना गया है। इस दिन दक्षिण दिशा में दीपक जलाकर पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है और उनके आशीर्वाद की कामना की जाती है। कुछ परंपराओं में पितरों के निमित्त चौमुखी दीपक जलाने तथा मुख्य द्वार पर दीपदान करने का विधान भी बताया गया है। मान्यता है कि ऐसा करने से परिवार पर पितरों की कृपा बनी रहती है और घर में सुख-शांति आती है।
पितरों के लिए दीपदान को उनकी विदाई और सम्मान से भी जोड़कर देखा जाता है। धार्मिक विश्वास है कि दीपक का प्रकाश पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा का प्रतीक है। इस दिन घर के बाहर दक्षिण दिशा में, मुख्य द्वार के समीप अथवा पीपल के पेड़ के नीचे दीपक जलाने की परंपरा कुछ स्थानों पर प्रचलित है। दीपदान करते समय लोग अपने पूर्वजों का स्मरण कर परिवार की खुशहाली और संकटों से रक्षा की प्रार्थना करते हैं।
परंपरा के अनुसार, नरक चतुर्दशी पर 14 दीपक घर के अलग-अलग स्थानों पर जलाए जा सकते हैं। इनमें एक दीपक यमराज के निमित्त मुख्य द्वार पर, दूसरा तुलसी के पौधे के पास, तीसरा रसोईघर में और चौथा दक्षिण दिशा में पितरों के नाम से जलाने की मान्यता है। इसके अतिरिक्त घर के अन्य स्थानों, जैसे आंगन, छत, बालकनी और पूजा स्थल पर भी दीपक प्रज्वलित किए जाते हैं। कुछ परिवारों में स्नानघर और भंडार कक्ष के पास भी दीपक रखने की परंपरा है।
नरक चतुर्दशी का पर्व केवल दीप जलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्मशुद्धि, सद्कर्म और परिवार के कल्याण का संदेश भी देता है। इस दिन प्रातःकाल स्नान, पूजा-पाठ और दीपदान का विशेष महत्व माना जाता है। श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण और यमराज का स्मरण करते हुए अपने परिवार की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और मंगल की कामना करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्रद्धा और विधि-विधान से किया गया दीपदान जीवन में सकारात्मकता और शांति का प्रतीक है।
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