12 साल की कठिन तपस्या पर निकलेगा जापानी बौद्ध भिक्षु, मंदिर के मकबरे में रहेगा एकांतवास

जापान के 31 साल के बौद्ध भिक्षु 12 साल की कठिन तपस्या शुरू कर रहे हैं। इस दौरान वह किसी से संपर्क नहीं रखेंगे और न ही बाहरी दुनिया के बारे में कोई जानकारी होगी। इस कठिन तपस्या में कई बौद्ध भिक्षु जान गंवा चुके हैं।

टोक्यो,एजेंसी। जापान में 31 वर्षीय बौद्ध भिक्षु सोगकु तागुची ने 12 वर्ष की कठिन तपस्या और एकांत साधना पर जाने का संकल्प लिया है। इस दौरान वह पूरी तरह बाहरी दुनिया से अलग रहेंगे। तागुची क्योटो के उत्तर-पूर्व में स्थित हिएई पर्वत पर बने एनर्याकुजी मंदिर के एक मकबरे में रहकर साधना करेंगे। बताया गया है कि इस अवधि में उनका दूसरे लोगों से कोई संपर्क नहीं होगा और उनकी साधना 11 सितंबर 2028 तक चलेगी।
यह कठिन साधना उन्हें ‘जिषिन’ बनने की दिशा में ले जाएगी। जिषिन का अर्थ ‘सच्चा देखने वाला’ बताया जाता है। तेंडाई बौद्ध परंपरा में जिषिन ऐसे भिक्षु को कहा जाता है जो इसके संस्थापक साइजो की समाधि की देखभाल के लिए समर्पित रहता है।
तागुची को इस दौरान बेहद कठिन और अनुशासित दिनचर्या का पालन करना होगा। उन्हें प्रतिदिन सूर्योदय से पहले उठकर भोजन तैयार करना होगा और उसे समाधि के सामने अर्पित करना होगा। इसके बाद कई घंटे मंत्रों का जाप करना होगा। साधना के दौरान बुद्ध के सामने प्रतिदिन करीब 3,000 बार दंडवत प्रणाम करने की भी परंपरा है। रात में उन्हें बेहद कम समय सोने की अनुमति होगी। मकबरे और उसके आसपास के परिसर को साफ रखना भी उनकी जिम्मेदारी होगी।
हिएई पर्वत की कठोर जलवायु इस साधना को और चुनौतीपूर्ण बनाती है। वर्षों तक चलने वाली इस प्रशिक्षण प्रक्रिया में शारीरिक श्रम और ध्यान दोनों को महत्वपूर्ण माना जाता है। सर्दियों में यहां पड़ने वाली कड़ाके की ठंड साधना को और कठिन बना देती है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, अतीत में कुछ भिक्षु बीमारी और कठिन परिस्थितियों के कारण यह प्रशिक्षण पूरा नहीं कर सके।
इस प्रशिक्षण का रिकॉर्ड 1699 से रखा जा रहा है। तागुची इस परंपरा में प्रशिक्षण लेने वाले 118वें जिषिन बताए जा रहे हैं। पिछले करीब 80 वर्षों में यह साधना करने वाले वह आठवें व्यक्ति होंगे।
हिएई पर्वत ‘कोइहोग्यो’ नामक एक अन्य कठिन बौद्ध अभ्यास के लिए भी प्रसिद्ध है। इसमें भिक्षु सात वर्षों के दौरान कुल 1,000 दिनों तक पर्वतीय क्षेत्र में पैदल यात्रा करते हैं। शुरुआती वर्षों में प्रतिदिन करीब 19 मील चलने की साधना से शुरुआत होती है, जबकि सातवें वर्ष में 100 दिनों तक प्रतिदिन करीब 52 मील चलना पड़ता है। पांचवें वर्ष को विशेष रूप से कठिन माना जाता है, जब 200 दिनों तक प्रतिदिन लगभग 19 मील चलने का अभ्यास किया जाता है।
इस साधना के बाद ‘दोइरी’ नामक नौ दिनों की कठिन प्रक्रिया भी होती है। इस दौरान साधक के लिए भोजन और पानी का त्याग, नींद न लेना और लेटना तक वर्जित बताया गया है। जापान की यह तपस्या परंपरा बौद्ध साधना के उन अत्यंत कठिन रूपों में शामिल है, जिनमें लंबे समय तक एकांत, शारीरिक अनुशासन और कठोर आध्यात्मिक अभ्यास का पालन किया जाता है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button