ब्रिक्स की बढ़ती ताकत से बदल रही वैश्विक व्यवस्था, बहुध्रुवीय दुनिया की ओर बढ़ता कदम
ब्रिक्स सोवियत संघ के विघटन के बाद एकध्रुवीय दुनिया को चुनौती देने के लिए रूस, भारत और चीन के त्रिकोणीय संगठन से शुरू होकर आज वैश्विक संतुलन का एक महत्वपूर्ण मंच बन गया है।

नई दिल्ली/एजेंसी। सोवियत संघ के विघटन के बाद शीत युद्ध का दौर समाप्त हुआ और विश्व व्यवस्था तेजी से एकध्रुवीय होती चली गई। अमेरिका की सैन्य, आर्थिक और रणनीतिक शक्ति के बढ़ते प्रभाव के बीच रूस, भारत और चीन जैसी उभरती शक्तियों ने वैश्विक संतुलन और बहुध्रुवीय व्यवस्था की आवश्यकता महसूस की। इसी विचार ने आगे चलकर रूस-भारत-चीन यानी आरआईसी और फिर ब्रिक्स के गठन की नींव रखी।
वर्ष 1998 में रूसी नेता येवगेनी प्रिमाकोव की भारत यात्रा के दौरान रूस, भारत और चीन के बीच त्रिकोणीय सहयोग की अवधारणा सामने आई। बाद में यह पहल आरआईसी के रूप में विकसित हुई और वर्ष 2002 से तीनों देशों के विदेश मंत्रियों की नियमित बैठकें शुरू हुईं। वर्ष 2006 में सेंट पीटर्सबर्ग में तीनों देशों के शीर्ष नेताओं की बैठक ने इस सहयोग को और मजबूती दी।
इसके बाद ब्राजील के जुड़ने से आरआईसी का विस्तार हुआ और ब्रिक का गठन हुआ। 16 जून 2009 को रूस के येकातेरिनबर्ग में ब्रिक का पहला शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ, जिसमें भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओ, रूस के राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव और ब्राजील के राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा ने हिस्सा लिया। उस समय पूरी दुनिया वैश्विक वित्तीय संकट से जूझ रही थी और उभरती अर्थव्यवस्थाएं वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में अपनी भूमिका बढ़ाने की कोशिश कर रही थीं।
वर्ष 2010 में दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने के बाद समूह का नाम ब्रिक्स हो गया। इसके बाद हर वर्ष शिखर सम्मेलन आयोजित होने लगे। सदस्य देशों के बीच सीमा विवाद, व्यापारिक मतभेद और रणनीतिक हितों में अंतर होने के बावजूद समूह ने संवाद और सहयोग का रास्ता बनाए रखा। समय के साथ मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया जैसे देश भी इसके विस्तार का हिस्सा बने।
ब्रिक्स की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उसने खुद को किसी सैन्य गठबंधन के रूप में विकसित नहीं किया। समूह का प्रमुख जोर विकास बैंक, आपसी व्यापार, स्थानीय मुद्राओं में लेन-देन और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दों पर रहा। बदलती वैश्विक परिस्थितियों के बीच ब्रिक्स अब केवल उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह नहीं रह गया है, बल्कि ग्लोबल साउथ की सामूहिक आवाज के एक महत्वपूर्ण मंच के रूप में अपनी पहचान बना रहा है।
वर्तमान सदस्यता और विस्तार के साथ ब्रिक्स विश्व की बड़ी आबादी और वैश्विक अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। समूह का बढ़ता प्रभाव इस बात का संकेत माना जा रहा है कि वे देश, जो लंबे समय से वैश्विक संस्थाओं में अपने अपेक्षाकृत कम प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल उठाते रहे हैं, अब सामूहिक रूप से अधिक प्रभावी भूमिका की मांग कर रहे हैं।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं की स्थापना ऐसे दौर में हुई थी, जब वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक शक्ति का संतुलन आज से काफी अलग था। ब्रिक्स इन संस्थाओं में सुधार और अधिक प्रतिनिधित्व की मांग को आगे बढ़ाने वाले मंचों में शामिल है। हालांकि समूह के सभी देश पश्चिमी देशों के साथ संबंधों और टकराव के मुद्दे पर एकमत नहीं हैं, लेकिन अधिक संतुलित और प्रतिनिधित्व वाली वैश्विक व्यवस्था की आवश्यकता को लेकर उनके बीच व्यापक सहमति दिखाई देती है।
ब्रिक्स की यात्रा में वर्ष 2014 और 2015 महत्वपूर्ण रहे। वर्ष 2014 में न्यू डेवलपमेंट बैंक की स्थापना का समझौता हुआ और 2015 में बैंक ने काम शुरू किया। इसका उद्देश्य विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं में बुनियादी ढांचे तथा सतत विकास से जुड़ी परियोजनाओं के लिए वित्त उपलब्ध कराना है। न्यू डेवलपमेंट बैंक ब्रिक्स के सबसे महत्वपूर्ण संस्थागत परिणामों में गिना जाता है और भारत सहित सदस्य देशों को विकास परियोजनाओं के लिए इससे वित्तीय सहायता मिलती रही है।
ब्रिक्स के भीतर स्थानीय मुद्राओं में कारोबार और भुगतान को बढ़ावा देने की चर्चा भी लगातार तेज हुई है। हालांकि समूह की ओर से स्पष्ट किया गया है कि इसका तत्काल उद्देश्य अमेरिकी डॉलर का स्थान लेने वाली कोई नई मुद्रा तैयार करना नहीं है। साझा ब्रिक्स मुद्रा की संभावना को लेकर भी निकट भविष्य में कोई ठोस कदम सामने नहीं आया है। विशेषज्ञों के अनुसार, वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में किसी एक मुद्रा और वित्तीय केंद्र पर निर्भरता कम करना एक लंबी प्रक्रिया हो सकती है।
हालांकि ब्रिक्स की बढ़ती ताकत के साथ उसके सामने कई चुनौतियां भी मौजूद हैं। चीन और भारत के बीच सीमा विवाद और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा है। रूस और पश्चिमी देशों के बीच संघर्ष ने वैश्विक राजनीति को प्रभावित किया है। ईरान और खाड़ी क्षेत्र के कुछ देशों के बीच भी रणनीतिक मतभेद हैं। इसके अलावा सदस्य देशों के बीच व्यापारिक असंतुलन और आर्थिक क्षमताओं में बड़ा अंतर भी समूह के लिए चुनौती है।
इन चुनौतियों के बावजूद ब्रिक्स की उपयोगिता को लेकर सदस्य देशों में व्यापक रुचि बनी हुई है। भारत सहित कई देश इसे किसी एक शक्ति के खिलाफ गठबंधन के बजाय वैश्विक शक्ति संतुलन को अधिक व्यापक और प्रतिनिधित्वपूर्ण बनाने के मंच के रूप में देखते हैं। ऐसे समय में जब विश्व व्यवस्था तेजी से बदल रही है, ब्रिक्स का विस्तार और उसकी बढ़ती सक्रियता बहुध्रुवीय विश्व की दिशा में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम के रूप में देखी जा रही है।




