16 दस्तावेजों के बावजूद नागरिकता साबित न कर सका व्यक्ति, गुवाहाटी हाई कोर्ट ने किया विदेशी घोषित
गुवाहाटी हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा कि नागरिकता साबित करने की जिम्मेदारी व्यक्ति की अपनी होती है। अदालत ने 16 दस्तावेज पेश करने के बावजूद अमीनुल हक को भारतीय नागरिक साबित करने में विफल रहने पर 'विदेशी' घोषित करने का फैसला बरकरार रखा।

गुवाहाटी/एजेंसी। क्या केवल दस्तावेज ही नागरिकता का एकमात्र आधार हो सकते हैं? इस महत्वपूर्ण प्रश्न पर गुवाहाटी हाई कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि ‘विदेशी अधिनियम’ के तहत खुद को भारतीय नागरिक साबित करने की पूरी जिम्मेदारी संबंधित व्यक्ति की होती है और केवल कागजात पेश करना पर्याप्त नहीं है।
हाई कोर्ट की जस्टिस कल्याण राय सुराना और जस्टिस शमीमा जहां की खंडपीठ ने 30 जून को दिए अपने आदेश में 16 दस्तावेज प्रस्तुत करने के बावजूद एक व्यक्ति की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता दस्तावेजों में नामों के अंतर को स्पष्ट करने और पारिवारिक संबंधों को कानूनी रूप से साबित करने में असफल रहा।
यह मामला असम के कामरूप जिले के निवासी अमिनुल हक से जुड़ा है, जिसे 28 फरवरी 2019 को विदेशी न्यायाधिकरण ने ‘विदेशी’ घोषित किया था। इसके खिलाफ अमिनुल ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी।
अदालत ने ‘विदेशी अधिनियम, 1946’ की धारा 9 का हवाला देते हुए कहा कि जब किसी व्यक्ति की नागरिकता पर संदेह होता है, तो खुद को भारतीय साबित करने का भार उसी व्यक्ति पर होता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रस्तुत दस्तावेजों की संख्या नहीं, बल्कि उनकी प्रमाणिकता और आपसी संगति अधिक महत्वपूर्ण होती है।
याचिकाकर्ता ने अपने पक्ष में 1951 के राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) की प्रति, 1966 से 2017 तक की मतदाता सूची, 1973 के भूमि दस्तावेज, पैन कार्ड, वोटर आईडी और स्कूल प्रमाणपत्र जैसे कई दस्तावेज प्रस्तुत किए थे। इसके बावजूद वह अपने परिवारिक संबंधों की कड़ी को ठोस रूप से स्थापित नहीं कर सका।
सुनवाई के दौरान अमिनुल के पिता ने अदालत में उपस्थित होकर उसे अपना पुत्र बताया, लेकिन अदालत ने इसे स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि बिना ठोस और कानूनी रूप से मान्य दस्तावेजी साक्ष्य के केवल मौखिक गवाही को प्रमाण नहीं माना जा सकता।
अदालत ने अपने निर्णय में दो प्रमुख कमियों का उल्लेख किया। पहली, याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर सका कि उसका परिवार विभिन्न वर्षों में अलग-अलग गांवों की मतदाता सूचियों में निरंतर रूप से मौजूद था। दूसरी, स्कूल के हेडमास्टर द्वारा जारी प्रमाणपत्र को प्रमाणित करने के लिए संबंधित अधिकारी की गवाही प्रस्तुत नहीं की गई।
अदालत ने माना कि केवल दस्तावेजों की संख्या पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके बीच तार्किक और कानूनी रूप से स्वीकार्य संबंध स्थापित होना आवश्यक है। इन आधारों पर हाई कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। यह फैसला नागरिकता से जुड़े मामलों में साक्ष्य के महत्व और कानूनी मानकों को लेकर एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है।




