छत्तीसगढ़ में बेलगाम अफसरशाही से हाहाकार: जनप्रतिनिधि बेबस, जनता त्रस्त

रायपुर/एजेंसी। छत्तीसगढ़ में प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। प्रदेश भर से मिल रही शिकायतों ने यह संकेत दिया है कि अफसरशाही पूरी तरह हावी हो चुकी है और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की अनदेखी आम बात बन गई है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि जनता की समस्याएं सुनने और उनका समाधान करने के बजाय उन्हें टालने का सिलसिला तेज हो गया है।
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, कई जिलों में सरकारी अधिकारी जनप्रतिनिधियों की बातों को महत्व नहीं दे रहे हैं। विकास कार्यों से जुड़े प्रस्ताव लंबित पड़े हैं, जबकि आम जनता सड़क, पानी, बिजली और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए दर-दर भटकने को मजबूर है। शिकायत करने के बावजूद लोगों को सिर्फ आश्वासन मिल रहा है, कार्रवाई नहीं।
आरोप यह भी है कि कई सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार और लापरवाही का बोलबाला है। फाइलें बिना लेन-देन के आगे नहीं बढ़तीं और आम नागरिकों को बार-बार कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। इससे लोगों में आक्रोश बढ़ता जा रहा है और प्रशासन के प्रति विश्वास लगातार कमजोर हो रहा है।
जनप्रतिनिधियों का भी कहना है कि उनकी बातों को नजरअंदाज किया जा रहा है, जिससे वे अपने क्षेत्र की समस्याओं का समाधान कराने में असहाय महसूस कर रहे हैं। इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भी सवाल उठ रहे हैं, जहां जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों की भूमिका सीमित होती जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रशासनिक तंत्र में जवाबदेही तय नहीं की गई और पारदर्शिता नहीं बढ़ाई गई, तो स्थिति और गंभीर हो सकती है। जनता अब सरकार से ठोस कदम उठाने की मांग कर रही है, ताकि अफसरशाही पर लगाम लग सके और आम लोगों को राहत मिल सके।
प्रदेश में बढ़ते असंतोष के बीच यह बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि आखिर कब सुधरेगी व्यवस्था और कब जनता को उनके अधिकारों का वास्तविक लाभ मिल पाएगा।



