भारत के पास कितने दिनों का बचा है पेट्रोल? संसदीय समिति की रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा

नई दिल्ली/एजेंसी। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच देश की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय से जुड़ी संसदीय स्थायी समिति ने अपनी ताजा रिपोर्ट में रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (एसपीआर) परियोजनाओं की धीमी प्रगति और बजट उपयोग में कमी पर सवाल उठाए हैं। समिति ने कहा है कि वैश्विक हालात को देखते हुए देश में 90 दिनों की खपत के बराबर पेट्रोलियम उत्पादों का भंडार होना चाहिए। जबकि हाल ही में पेट्रोलियम मंत्रालय ने संसद को बताया है कि देश के पास 9.5 दिनों का एसपीआर है और सरकारी तेल कंपनियों के पास 64.5 दिनों का भंडार है यानी कुल 74 दिनों का भंडार है।
समिति ने कहा है कि, ‘भारत में फिलहाल विशाखापत्तनम, मंगलुरु और पाडुर में 53.3 लाख मैट्रिक टन क्षमता के रणनीतिक भंडार मौजूद हैं, जिनका संचालन भारतीय रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार लिमिटेड (आईएसपीआरएल) कर रही है। ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए 8 जुलाई 2021 को फेज-दो के तहत ओडिशा के चांदीखोल और कर्नाटक के पाडुर में 65 लाख एमएमटी क्षमता के दो नए भंडार बनाने को मंजूरी दी गई थी, लेकिन करीब पांच साल बाद भी इन परियोजनाओं में अपेक्षित प्रगति नहीं हो पाई है।’
अचरच की बात यह है कि पूर्व में कई बार एसपीआर की जरुरत पर संसदीय समिति की तरफ से याद दिलाने के बावजूद इसकी प्रगति बहुत ही सुस्त है। हालात यह है कि जितना बजटीय आवंटन हो रहा है उसका महज दस फीसद ही खर्च हो पा रहा है।
पश्चिम एशिया का मौजूदा संकट बताता है कि अगर रणनीतिक भंडार पर तेजी से काम हुआ होता तो आज देश की ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ी चिंताएं कम होती। रिपोर्ट के मुताबिक, इन परियोजनाओं के लिए बजटीय आवंटन लगातार घटाया गया है और वास्तविक खर्च बेहद कम रहा है।
वित्त वर्ष 2023-24 में 508 करोड़ रुपये के बजट अनुमान को संशोधित कर 40 करोड़ रुपये कर दिया गया, जबकि कोई खर्च नहीं हो सका। 2024-25 में 408 करोड़ रुपये से घटाकर 30 करोड़ रुपये किया गया, जिसमें केवल 17.25 करोड़ रुपये खर्च हुए। वहीं 2025-26 में 100 करोड़ रुपये के बजट को घटाकर 20 करोड़ रुपये किया गया, जिसमें 14.54 करोड़ रुपये ही खर्च हुए। 2026-27 के लिए भी केवल 20 करोड़ रुपये का प्राविधान रखा गया है। समिति ने कहा कि बजट अनुमानों को बार-बार कम करने की प्रवृत्ति से बचना चाहिए और परियोजनाओं को तेजी से जमीन पर उतारा जाना चाहिए। खासकर पाडुर-दो परियोजना में पीपीपी मॉडल के तहत बोली प्रक्रिया और अन्य चरणों में देरी के कारण तय समय पर फंड का उपयोग नहीं हो सका।
समिति ने मंत्रालय को सलाह दी है कि वह यथार्थवादी और जरूरत आधारित बजट अनुमान तैयार करे, जिसमें भूमि अधिग्रहण, परियोजना की तैयारी और अनुबंधीय माइलस्टोन को ध्यान में रखा जाए। साथ ही, रणनीतिक महत्व की परियोजनाओं में आवंटित धन का पूरा उपयोग सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया है। रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया गया है कि देश में जहां भी भौगोलिक परिस्थितियां अनुकूल हों, वहां और अधिक भूमिगत भंडार (कैवर्न) बनाने की संभावनाएं तलाशी जाएं।

90 की जगह महज... भारत के पास कितने दिनों का बचा है पेट्रोल? संसदीय समिति की  रिपोर्ट में हुआ खुलासा - indias energy security spr project delays budget  cuts

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