उत्तर प्रदेश बार काउन्सिल द्वारा जारी पत्र शर्मनाक कार्यवाही का अंग : इण्डियन काउन्सिल ऑफ़ ह्यूमन राइट्स
हर मुद्दे पर वार्ता को तैयार मानवाधिकार

कानपुर/उत्तर प्रदेश। केंद्र की मोदी सरकार अधिवक्ता अधिनियम 1961 में संशोधन कर नया कानून लाने की तैयारी कर रही है। सरकार ने इसके लिए अधिवक्ता संशोधन बिल 2025 का ड्राफ्ट तैयार कर लिया है। इस विधेयक से देश के 27 लाख अधिवक्ताओं के अधिकार प्रभावित होंगे। नए विधेयक के अनुसार वकीलों पर हर्जाना और जुर्माना लगाया जा सकेगा। बार काउंसिल ऑफ इंडिया में सरकारी हस्तक्षेप बढ़ेगा। विरोध में उत्तर प्रदेश की सभी अदालतें और इलाहाबाद उच्च न्यायालय बंद हैं। दिल्ली की अदालतें भी लगातार बंद चल रही हैं। वकीलों का कहना है कि सरकार उनकी लंबित मांगों पर ध्यान नहीं दे रही है। जूनियर वकीलों के लिए स्टाइपेंड, चैंबर, मेडिकल बीमा और पेंशन जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं दी गई हैं। अधिवक्ता सुरक्षा अधिनियम की मांग भी लंबे समय से लंबित है। वकीलों ने इस विधेयक को न्यायपालिका की स्वतंत्रता और कानून के शासन के खिलाफ बताया है। उनका कहना है कि यह विधेयक अधिवक्ताओं की आजादी को सीमित करने वाला है और इसे तुरंत वापस लिया जाना चाहिए।
इण्डियन काउन्सिल ऑफ हयूमन राइट्स द्वारा बताया गया है कि उत्तर प्रदेश बार आउन्सिल इलाहाबाद द्वारा जारी विधिक लाइसेन्स, जो अधिवक्ता अधिनियम से जुडाव रखते हैं, जिसकी अवहेलन के रहते जांच प्रक्रिया का पालन किया जाना ही लाइसेन्स की बैधता पर मान्य है। पुलिस प्रशासन को पत्र जारी करके अधिवक्ताओं को दागी दर्शाना व सूची सार्वजनिक कराना शर्मनाक प्रक्रिया का भारी परिणाम बनकर उभरा है। काउन्सिल स्वयं निर्णय लेने के लिये सक्षम है। यदि किन्हीं विशेष कारणों के रहते कार्यवाही करने में अपने को लाचार व मजबूर समझ रहा है तो मामले को चेयरमैन/अध्यक्ष बार काउन्सिल ऑफ इण्डिया नई दिल्ली अथवा जनपद न्यायाधीश कानपुर नगर की सहभागिता से मामलों का निस्तारण कर सकता था परन्तु पुलिस प्रशासन को पत्र जारी करना अवश्य ही न्याय व्यवस्था में विनाशकारी परिस्थितियों को जन्म देने का संकेत है। पुलिस प्रशासन का दायरा मात्र ”लाॅ एण्ड आर्डर” मेन्टेन करना व जमीनी विवादों में दखलन्दाजी ना देने तक ही सीमित है जिसे पुलिस रेग्यूलेशन एक्ट में भी दर्शाया गया है। थानों में दर्ज मुकदमे समाप्त होने पर भी उनका बेजा रिकार्ड बनाये रखना तथा सार्वजनिक करना पुलिस प्रशासन के जिम्मेदार लोकसेवकों की सेवा कार्यों में लापरवाही का प्रबल कारण बनकर उभरा है जो भविष्य के लिये न्याय तन्त्र व न्याय शास्त्र का खुले आम किरकिरी का दॅश है व अवश्य ही भारतीय संविधान के अनुच्छेद-21 का खुलकर दुरूपयोग किया गया है। पीडितों के शोषित उत्पीडन में भारी मानसिक प्रताडना पहुॅचाने में दण्डात्मक अपराधिक कृत्य किया गया है। इण्डियन काउन्सिल ऑफ हयूमन राइट्स के राष्ट्रीय महासचिव ए0 सी0 कपूर ने कहा कि मानवाधिकार काउन्सिल सभी लिप्त दोषी जिम्मेदार लोकसेवकों पर सक्षम क्षेत्राधिकार न्यायालयों में उचित कार्यवाही दाखिल करने का विधिक अधिकार सुरक्षित रखता है। पूर्व में काउन्सिल प्रश्नगत मामले में जिम्मेदार सक्षम अधिकारियों को चेताया जा चुका है।




