नार्को टेस्ट में आफताब उगलेगा श्रद्धा के मर्डर का सच?

  • पुलिस की पूछताछ में श्रद्धा की हत्या कबूल कर चुका है आफताब
  • बार-बार बदले बयान, जांच में पूरी तरह सहयोग नहीं कर रहा आरोपी
  • पुलिस ने कोर्ट से आफताब की नार्को टेस्ट कराने की मांगी थी अनुमति

नई दिल्ली।दिल्ली की साकेत कोर्ट ने बुधवार को अपनी लिव-इन पार्टनर श्रद्धा वाकर की बेरहमी से हत्या करने वाले आफताब अमीन पूनावाला के नार्को टेस्ट को मंजूरी दे दी। दिल्ली पुलिस ने नार्को टेस्ट के लिए यह कहते हुए अनुमति मांगी थी कि वह जांच में सहयोग नहीं कर रहा है। कोर्ट की तरफ से नार्को टेस्ट की मंजूरी मिलने के बाद श्रद्धा मर्डर केस की असलियत सामने आने का अनुमान है। पुलिस को उम्मीद है कि नार्को टेस्ट के बाद आरोपी को सजा दिलाने में अहम जानकारी हासिल की जा सकेगी। आखिर यह नार्को टेस्ट होता क्या है? यह नार्को टेस्ट कैसे किया जाता है। इसके बारे में डीटेल से जानते हैं।

नार्को टेस्ट क्या होता है?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 20 के अनुसार किसी भी अपराधी को खुद की गवाही के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। साथ ही किसी भी जांच एजेंसी द्वारा दबाव डालकर अथवा डरा-धमका कर किसी दोषी से उसके खिलाफ गवाही नहीं ली जा सकती है। यदि ऐसा होता है तो कोर्ट में उसे स्वीकार नहीं किया जाएगा। इस हालत में नार्को टेस्ट, ब्रेन मैपिंग और लाई डिटेक्टर जैसी तकनीकें कारगर हो सकती हैं। नार्को टेस्ट का इस्तेमाल सच्चाई का पता लगाने के लिए किया जाता है। इसमें तकनीकों का इस्तेमाल कर आरोपी के दिमाग को संज्ञाशून्य बना दिया जाता है। साथ ही मस्तिष्क की तरंगों, पल्स रेट और ब्लड प्रेशर को रेकॉर्ड किया जाता है।
कैसे होता है नार्को टेस्ट
इस टेस्ट में संबंधित शख्स को कुछ दवाइयां या इंजेक्शन दिया जाता है। इस टेस्ट में सामान्य तौर पर पर ट्रूथ ड्रग नाम की एक साइकोऐक्टिव दवा दी जाती है। इसके बाद सोडियम पेंटोथोल का इंजेक्शन लगाया जाता है। इस दवा के असर से शख्स अर्धबेहोशी की हालत में चला जाता है यानी न उसे पूरी तरह होश होता है और न ही पूर्ण बेहोश होता है। ऐसी स्थिति में वह पूछे जाने वाले सवालों का सही-सही जवाब देता है। चूंकि जिससे पूछताछ की जा रही है वह शख्स अर्धबेहोशी की हालत में होता है तो वह झूठ गढ़ पाने में नाकाम होता है।

ठोस आधार पर मिलती है नार्को टेस्ट की परमिशन
इन तकनीकों का इस्तेमाल ज्यादातर विकसित देशों में किया जाता है। इन देशों में इन तकनीकों का इस्तेमाल साक्ष्य के रूप में किया जाता है।, जबकि भारत में ऐसा तब तक नहीं किया जा सकता, जब तक पुलिस की जांच में बनाए गए स्टेटमेंट का कोई ठोस आधार न हो। यदि हम इन जांचों की बात करें तो स्पष्ट है कि इनसे अब तक न तो किसी की जान गई है और न ही कोई शारीरिक क्षति देखी गई है। बात जब इस तरह के टेस्ट की होती है तो पॉलिग्राफ, नार्को या ब्रेन मैपिंग टेस्ट के नतीजे 100% सही ही आएं। कई ऐसे मामले भी हुए हैं जिसमें कुछ हार्डकोर क्रिमिनल इन टेस्ट को भी चकमा देने में कामयाब हो जाते हैं। हालांकि, एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर इन टेस्ट को ठीक तरीके से किया जाए तो सही नतीजे निकलते हैं।

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