नवरात्र में शोक, दीपावली पर पूर्वजों की पूजा: असुर जनजाति की अनूठी परंपरा में महिषासुर को मानते हैं राजा और आराध्य
झारखंड समेत देश के कई हिस्सों के सुदूरवर्ती गांवों में रहने वाले असुर आदिम जनजाति समुदाय के लोगों के लिए शारदीय नवरात्र में पर्व का उत्साह नहीं होता। इस दौरान वो अपने आराध्य देव महिषासुर के वध पर शोक मनाते हैं।

रांची,एजेंसी। देशभर में जहां नवरात्र और दुर्गा पूजा का उत्सव मनाया जाता है, वहीं झारखंड की असुर जनजाति के लिए यह समय शोक और स्मरण का होता है। समुदाय के लोग महिषासुर को अपना राजा, पूर्वज और आराध्य देव मानते हैं तथा दशहरा के अवसर पर महिषासुर वध को लेकर शोक मनाने की परंपरा निभाते हैं। दीपावली के दौरान भी उनकी धार्मिक मान्यताएं मुख्यधारा के उत्सवों से अलग दिखाई देती हैं। इस अवसर पर वे अपने पूर्वजों, आराध्य देवताओं, प्रकृति और मवेशियों से जुड़ी परंपराओं का पालन करते हैं।
रांची विश्वविद्यालय के अतिथि शिक्षक डॉ. संजय तिर्की के अनुसार, आधुनिक समाज में आए बदलावों का असर असुर जनजाति की संस्कृति और परंपराओं पर भी पड़ा है। इसके बावजूद समुदाय के लोग सदियों से चली आ रही मान्यताओं को सहेजने का प्रयास कर रहे हैं। देश के कई अन्य आदिवासी समुदायों की तरह असुर जनजाति की धार्मिक परंपराएं भी मुख्य रूप से मौखिक मान्यताओं और प्रकृति की पूजा पर आधारित हैं। समुदाय का कोई एक सर्वमान्य धार्मिक ग्रंथ नहीं है और प्रकृति उनके जीवन तथा आस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। महिषासुर को भी उनके आराध्य देवताओं में स्थान प्राप्त है।
गुमला जिले के चौरापाट गांव में कार्यरत शिक्षकेत्तरकर्मी मिलन असुर का कहना है कि असुर समुदाय लंबे समय तक शिक्षा, आर्थिक स्थिति और सामाजिक अवसरों के मामले में पिछड़ा रहा। उनके मुताबिक, इतिहास में महिषासुर और असुर समाज की छवि जिस तरह प्रस्तुत की गई, उससे समुदाय की मान्यताओं और दृष्टिकोण को पर्याप्त जगह नहीं मिल सकी। उन्होंने कहा कि लंबे समय तक समाज के लोगों को हीन दृष्टि से देखा गया, लेकिन शिक्षा के प्रसार और जागरूकता के साथ लोगों के नजरिये में बदलाव आ रहा है। मिलन असुर के अनुसार, दीपावली के दौरान समुदाय के लोग अपने पूर्वजों और आराध्य देवताओं के साथ राजा महिषासुर का भी स्मरण और पूजन करते हैं।
नवरात्र के दौरान शोक मनाने की परंपरा का उल्लेख करते हुए मिलन असुर ने बताया कि रांची के जोन्हा और पश्चिम बंगाल के पुरुलिया क्षेत्र में महिषासुर की प्रतिमा स्थापित कर पूजा करने की परंपरा भी रही है। उन्होंने बताया कि इस वर्ष 10 अक्टूबर को पुरुलिया के हुजूल दुर्गा क्षेत्र में आयोजित कार्यक्रम में शामिल होने के लिए उन्हें आमंत्रित किया गया था।
गुमला जिले के बिशुनपुर प्रखंड के पहाड़ी इलाकों में असुर समुदाय की बड़ी आबादी रहती है। जोभीपाठ, अनतीपानी, चांपाकोना, छातासराय, नवाटोली, डीपाकुजाम, कोनारपाठ, चोटोगपाठ, गाढ़ा कुजाम, पोलपोल पाठ, पिरहापाठ, गोरा पहाड़ और रामझरिया पाठ जैसे गांवों में समुदाय के लोग अपनी परंपराओं के अनुसार दशहरा के दिन महिषासुर के लिए शोक मनाते हैं। वहीं, दीपावली के अवसर पर भैंसासुर की पूजा किए जाने की भी मान्यता है।
दीपावली के दिन जब अधिकांश स्थानों पर घर रोशनी से सजाए जाते हैं और पटाखे चलाए जाते हैं, तब असुर समुदाय के घरों में अलग तरह के अनुष्ठान होते हैं। समुदाय की परंपरा के अनुसार, अमावस्या की सुबह गाय, भैंस, बकरी और अन्य मवेशियों को नहलाकर उन्हें एरंडी की डालियां दी जाती हैं। रात में मिट्टी के दीपों में कुकरी या करंज का गर्म तेल डाला जाता है। तेल से भरे दीपों में उड़द की दाल डालने की भी परंपरा बताई जाती है। इसके बाद समुदाय के पुरुष तेल को नाभि, छाती और कानों पर लगाते हैं। मवेशियों के सींगों पर भी तेल लगाया जाता है। जिन पशुओं के सींगों पर तेल लगाना संभव नहीं होता, उन पर शगुन के रूप में तेल छिड़का जाता है।
इस दिन खिचड़ी खाने और असुर मंत्रों का पाठ करने की परंपरा भी बताई जाती है। समुदाय के कुछ अनुष्ठानों में मुर्गे की बलि दी जाती है। इसके बाद हड़िया और मकई से बने खाद्य पदार्थ मवेशियों को खिलाने का रिवाज है। इन परंपराओं में मवेशियों को विशेष महत्व दिया जाता है, क्योंकि वे समुदाय के पारंपरिक जीवन और आजीविका से जुड़े हैं।
समुदाय की मान्यताओं के अनुसार, दशहरा के दिन देवी के प्रकोप की आशंका के कारण लोग घरों से बाहर निकलने से बचते हैं। हालांकि, बदलते सामाजिक परिवेश और सांस्कृतिक मेलजोल के चलते अब कुछ लोग दुर्गा पूजा के आयोजनों में भी शामिल होने लगे हैं। इससे समुदाय की पारंपरिक मान्यताओं और आधुनिक सामाजिक संपर्क के बीच बदलते रिश्तों की झलक मिलती है।
असुर समाज में गुमला जिले के टांगीनाथ से जुड़ी एक मान्यता भी प्रचलित है। समुदाय के कुछ लोग वहां मौजूद त्रिशूलनुमा लोहे के अस्त्र को राजा महिषासुर का हथियार मानते हैं और दावा करते हैं कि इसे असुरों ने बनाया था। उनके अनुसार, इस प्राचीन अस्त्र पर अब तक जंग नहीं लगी है और समुदाय के लोग आज भी उसकी पूजा करते हैं।
असुर जनजाति की ये परंपराएं झारखंड की सांस्कृतिक विविधता को दर्शाती हैं। महिषासुर को लेकर उनकी आस्था, पूर्वजों का स्मरण, प्रकृति की पूजा और मवेशियों से जुड़े अनुष्ठान उनकी सामुदायिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इन मान्यताओं को समझने के लिए जरूरी है कि उन्हें समुदाय के अपने ऐतिहासिक अनुभवों और सांस्कृतिक दृष्टिकोण के संदर्भ में देखा जाए।




