बच्चों के दिमाग पर दिख रहा अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड का असर, स्वादिष्ट चीजें देखकर बढ़ती है रिवॉर्ड सेंटर की सक्रियता
एक नई स्टडी के अनुसार, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड खाने से बच्चों के दिमाग का रिवॉर्ड सिस्टम ज्यादा एक्टिव हो जाता है, जिससे उनमें तेजी से मोटापा बढ़ता है।

लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। स्कूल से लौटने के बाद चिप्स खाना, शाम के नाश्ते में बिस्कुट लेना या कभी-कभार बर्गर और फ्रेंच फ्राइज का स्वाद चखना बच्चों के बीच आम बात है। लेकिन अब एक नए शोध ने बच्चों की खानपान की आदतों को लेकर चिंता बढ़ा दी है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, अल्ट्रा प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों का अधिक सेवन बच्चों के मस्तिष्क की उस गतिविधि से जुड़ा हो सकता है, जो इनाम, प्रेरणा और आदतों के विकास में भूमिका निभाती है। अध्ययन में यह भी सामने आया कि भोजन से जुड़े संकेतों पर मस्तिष्क की अधिक सक्रिय प्रतिक्रिया का संबंध अगले एक वर्ष में शरीर की चर्बी और बॉडी मास इंडेक्स में बढ़ोतरी से हो सकता है।
यह शोध 23 अक्टूबर 2026 को प्रतिष्ठित चिकित्सा शोध पत्रिका ‘जामा नेटवर्क ओपन’ में प्रकाशित हुआ है। इसमें सात से दस वर्ष की आयु के 46 ऐसे बच्चों को शामिल किया गया, जिनका वजन अध्ययन की शुरुआत में स्वस्थ श्रेणी में था। शोधकर्ताओं ने बच्चों के खानपान का आकलन किया और उन्हें कुकीज तथा फ्रेंच फ्राइज जैसे स्वादिष्ट खाद्य पदार्थों की तस्वीरें दिखाकर उनके मस्तिष्क की प्रतिक्रिया का अध्ययन किया। इसके लिए चुंबकीय अनुनाद इमेजिंग तकनीक का इस्तेमाल किया गया। इसके बाद करीब एक वर्ष तक बच्चों के वजन, शरीर में चर्बी और कमर के आकार में हुए बदलावों का आकलन किया गया।
अध्ययन में पाया गया कि जिन बच्चों के रोजाना के भोजन में अल्ट्रा प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों से मिलने वाली कैलोरी का अनुपात अधिक था, उनके मस्तिष्क के डॉर्सल स्ट्रायटम नामक हिस्से में खाद्य पदार्थों की तस्वीरें देखने पर अधिक सक्रियता दर्ज की गई। मस्तिष्क का यह हिस्सा इनाम की अनुभूति, प्रेरणा, सीखने और आदतों से जुड़ी प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। शोधकर्ताओं के अनुसार, इस हिस्से की अधिक सक्रिय प्रतिक्रिया का संबंध अगले एक वर्ष में बॉडी मास इंडेक्स और शरीर में वसा की मात्रा में अधिक बढ़ोतरी से भी देखा गया।
शोध में यह भी सामने आया कि अल्ट्रा प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों का अधिक सेवन करने वाले बच्चों में एक वर्ष के दौरान कमर के आकार में बढ़ोतरी का संबंध पाया गया। हालांकि, अध्ययन के अलग-अलग विश्लेषणों में वजन और शरीर की चर्बी से जुड़े परिणामों की सांख्यिकीय मजबूती एक जैसी नहीं थी। इसलिए इन नतीजों को सावधानी से समझने की जरूरत है।
विशेषज्ञों के लिए इस अध्ययन का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसमें शामिल सभी बच्चे शुरुआत में स्वस्थ वजन की श्रेणी में थे। इससे यह समझने का अवसर मिला कि मोटापे की समस्या सामने आने से पहले ही खानपान और मस्तिष्क की भोजन संबंधी प्रतिक्रिया के बीच किस तरह का संबंध हो सकता है। शोध यह संकेत देता है कि स्वादिष्ट खाद्य पदार्थों को देखकर मस्तिष्क में पैदा होने वाली इनाम संबंधी प्रतिक्रिया बच्चों की आगे की खानपान की आदतों और शरीर की बनावट से जुड़ी हो सकती है।
हालांकि, शोध के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि जंक फूड बच्चों के मस्तिष्क को स्थायी रूप से बदल रहा है या बच्चे इसके आदी हो चुके हैं। यह अध्ययन अवलोकन पर आधारित था, इसलिए इससे यह साबित नहीं होता कि अल्ट्रा प्रोसेस्ड भोजन ही मस्तिष्क की सक्रियता या वजन बढ़ने का सीधा कारण है। यह भी संभव है कि जिन बच्चों का मस्तिष्क स्वादिष्ट भोजन के संकेतों पर स्वाभाविक रूप से अधिक प्रतिक्रिया देता है, वे ऐसे खाद्य पदार्थों की ओर ज्यादा आकर्षित होते हों। शोधकर्ताओं ने अध्ययन में प्रतिभागियों की कम संख्या और मस्तिष्क की गतिविधि को केवल एक समय पर मापे जाने जैसी सीमाओं का भी उल्लेख किया है।
शोध में यह संकेत भी मिला कि इस संबंध को केवल चीनी की मात्रा से नहीं समझा जा सकता। अल्ट्रा प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों में अक्सर वसा और कार्बोहाइड्रेट का ऐसा मेल होता है, जो स्वाद और खाने की इच्छा को प्रभावित कर सकता है। अतिरिक्त चीनी को ध्यान में रखकर विश्लेषण करने पर कुछ संबंध कमजोर जरूर हुए, लेकिन इससे स्पष्ट होता है कि खानपान और मस्तिष्क की प्रतिक्रिया के पीछे कई कारक हो सकते हैं।
बच्चों के स्वास्थ्य के लिहाज से यह शोध संतुलित और पौष्टिक भोजन की अहमियत को फिर सामने लाता है। अभिभावकों के लिए जरूरी है कि बच्चों के रोजाना के आहार में फल, सब्जियां, दालें, साबुत अनाज और घर में बने पौष्टिक विकल्पों को प्राथमिकता दें। चिप्स, मीठे बिस्कुट, पैकेट बंद स्नैक्स और अन्य अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का सेवन सीमित रखना बेहतर है। शोधकर्ताओं का मानना है कि इस विषय पर बड़े स्तर पर और लंबे समय तक अध्ययन किए जाने की जरूरत है, ताकि बच्चों के खानपान, मस्तिष्क की प्रतिक्रिया और शारीरिक विकास के बीच संबंध को अधिक स्पष्टता से समझा जा सके।



