गोरखपुर के नीलकंठ महादेव मंदिर के शिवलिंग पर अरबी-फारसी में लिखा ‘बिस्मिल्लाह हिर्र रहमान निर्रहीम’, पुरातत्व विभाग ने शुरू की जांच

गोरखपुर,उत्तर प्रदेश। जिले के दक्षिणांचल में खजनी क्षेत्र के सरया तिवारी गांव स्थित प्राचीन नीलकंठ महादेव मंदिर में स्थापित शिवलिंग पर अंकित अरबी-फारसी लेख लंबे समय से लोगों के कौतूहल का विषय बने हुए हैं। शिवलिंग की प्राचीनता और उस पर अंकित लेख किस कालखंड के हैं, इसे लेकर वर्षों से चर्चा होती रही है। अब इस रहस्य से पर्दा उठाने की दिशा में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने जांच शुरू की है। नागपुर से पहुंची पुरातत्व विशेषज्ञों की टीम ने मंदिर परिसर का निरीक्षण करने के साथ शिवलिंग और उस पर अंकित लेखों के नमूने भी लिए हैं।
सरया तिवारी गांव में स्थित नीलकंठ महादेव मंदिर में दूर-दराज से श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। मंदिर में स्थापित शिवलिंग पर अरबी-फारसी भाषा में दिखाई देने वाले शब्द श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों के लिए लंबे समय से जिज्ञासा का विषय हैं। स्थानीय स्तर पर कई बार शिवलिंग की प्राचीनता और लेखों के कालखंड का पता लगाने की कोशिश की गई, लेकिन अब तक कोई अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं आया।
ग्राम प्रधान प्रतिनिधि रणधीर राम त्रिपाठी के अनुसार, उन्होंने मंदिर के सर्वेक्षण का मुद्दा उठाया था और इस संबंध में क्षेत्रीय विधायक राम चौहान तथा सांसद एवं केंद्रीय मंत्री कमलेश पासवान से भी चर्चा की थी। इसके बाद संस्कृति विभाग के स्तर से प्रक्रिया आगे बढ़ी। इसी क्रम में बुधवार को संस्कृति मंत्रालय के एपीग्राफी विभाग के निदेशक मुनिरत्नम के निर्देश पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की टीम मंदिर परिसर पहुंची। टीम का नेतृत्व डॉ. मोहम्मद आफताब जेया ने किया।
पुरातत्व विशेषज्ञों की टीम ने शिवलिंग और उस पर अंकित लेखों का निरीक्षण करने के साथ आवश्यक नमूने लिए। टीम से जुड़े डॉ. जेया के प्रारंभिक आकलन के अनुसार, शिवलिंग करीब 2500 वर्ष पुराना हो सकता है, जबकि उस पर अंकित अरबी-फारसी लेख लगभग एक हजार वर्ष पुराने होने की संभावना जताई गई है। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि वास्तविक स्थिति जांच पूरी होने और वैज्ञानिक परीक्षण के बाद ही सामने आएगी। इसलिए फिलहाल इन आकलनों को अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।
प्रारंभिक निरीक्षण में शिवलिंग पर अरबी में ‘बिस्मिल्लाह हिर्रहमान निर्रहीम’ जैसे शब्द दिखाई देने की बात कही गई है। वहीं शिवलिंग के निचले हिस्से में ब्राह्मी लिपि से जुड़े संकेत मिलने की भी जानकारी सामने आई है। इन लेखों की वास्तविक प्राचीनता, स्वरूप और उनके अंकित किए जाने के समय का निर्धारण पुरातात्विक जांच के बाद ही संभव होगा।
मंदिर से जुड़े भागवत आचार्य अतुल राम त्रिपाठी के अनुसार, पूर्व में गोरखपुर विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग की टीम ने क्षेत्र का सर्वेक्षण किया था। मंदिर परिसर के पास स्थित पोखरे की खुदाई के दौरान खंडित सूर्य प्रतिमा और पुरानी ईंटें मिलने की बात भी सामने आई थी। उनके अनुसार, मंदिर परिसर से पूर्व में मुगलकालीन तलवारें मिलने की जानकारी भी स्थानीय स्तर पर रही है। हालांकि, इन सभी पुरातात्विक अवशेषों की प्रामाणिकता और काल निर्धारण के लिए विशेषज्ञ जांच आवश्यक है।
मंदिर की लोकप्रियता और श्रद्धालुओं की रुचि को देखते हुए पर्यटन विभाग की ओर से मंदिर के जीर्णोद्धार और धर्मशाला निर्माण के लिए 1.79 करोड़ रुपये के अनुदान की जानकारी भी दी गई है। अब लोगों की नजर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की जांच रिपोर्ट पर है, जिससे शिवलिंग की वास्तविक प्राचीनता और उस पर अंकित लेखों के इतिहास से जुड़े सवालों का वैज्ञानिक आधार पर जवाब मिलने की उम्मीद है।
शिवलिंग पर अंकित लेखों को लेकर स्थानीय स्तर पर एक प्रचलित मान्यता भी है। गांव के कुछ बुजुर्गों का कहना है कि महमूद गजनवी के भारत पर आक्रमण के दौरान उसकी सेना मंदिर तक पहुंची थी और शिवलिंग को उखाड़ने का प्रयास किया गया था। स्थानीय मान्यता के अनुसार, प्रयास सफल नहीं होने पर शिवलिंग पर कलमा अंकित कर दिया गया। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र ऐतिहासिक या पुरातात्विक पुष्टि अभी सामने नहीं आई है। स्थानीय पत्रकार शशांक त्रिपाठी ने भी बताया कि उन्होंने बचपन से यह कहानी सुनी है।
फिलहाल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की टीम द्वारा लिए गए नमूनों और आगे होने वाली वैज्ञानिक जांच से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि शिवलिंग की वास्तविक प्राचीनता कितनी है और उस पर अंकित लेख किस कालखंड के हैं। जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद ही मंदिर और शिवलिंग से जुड़े इस लंबे समय से चले आ रहे रहस्य की ऐतिहासिक स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकेगी।

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