झरिया की भूमिगत आग पर काबू पाने में बड़ी प्रगति, 77 में अब सिर्फ सात अग्नि स्थल बाकी
झरिया की भूमिगत आग एक सदी से अधिक पुरानी पर्यावरणीय समस्या है, जो 1916 से लगातार सुलग रही है। लेकिन इस आग पर काबू पाने में बीसीसीएल ने बड़ी प्रगति हासिल की है और अगले साल दिसंबर तक आग पर काबू पा लिए जाने की संभावना है।

धनबाद,झारखंड। धनबाद जिले की झरिया कोयला खदानों में एक सदी से अधिक समय से सुलग रही भूमिगत आग पर काबू पाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। झरिया कोलफील्ड में कभी 77 अग्नि स्थल चिन्हित किए गए थे, जिनमें अब केवल सात अग्नि स्थल शेष बताए जा रहे हैं। वहीं, आग से प्रभावित क्षेत्रफल भी घटकर करीब 1.8 वर्ग किलोमीटर रह गया है। प्रशासन और संबंधित एजेंसियों ने दिसंबर 2027 तक शेष अग्नि स्थलों पर नियंत्रण पाने का लक्ष्य निर्धारित किया है।
झरिया की भूमिगत आग का इतिहास 1916 से जुड़ा है। ब्रिटिश शासन के दौरान अवैज्ञानिक तरीके से किए गए खनन के कारण कोयला हवा के संपर्क में आया और कई स्थानों पर आग भड़क उठी। समय के साथ यह आग भूमिगत हिस्सों में फैलती गई और झरिया के बड़े भूभाग को प्रभावित करने लगी। आग के कारण जमीन धंसने, जहरीली गैसों के रिसाव और विस्थापन जैसी समस्याएं लंबे समय से क्षेत्र की चुनौती बनी हुई हैं।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, झरिया अग्नि प्रभावित क्षेत्र में आग का दायरा पहले करीब 8.9 वर्ग किलोमीटर था, जो अब घटकर लगभग 1.8 वर्ग किलोमीटर रह गया है। अग्नि स्थलों की संख्या में भी उल्लेखनीय कमी आई है। संबंधित एजेंसियां शेष सात अग्नि स्थलों पर नियंत्रण के लिए तकनीकी उपायों के साथ लगातार काम कर रही हैं।
भूमिगत आग पर नियंत्रण के साथ ही झरिया के प्रभावित परिवारों के पुनर्वास की प्रक्रिया भी जारी है। पुनर्वास योजना के तहत अब तक 32,049 आवासों का निर्माण किया जा चुका है। हालांकि, इनमें से अभी तक 7,334 परिवारों को ही नए आवासों में स्थानांतरित किया जा सका है। इससे स्पष्ट है कि बड़ी संख्या में प्रभावित परिवारों का पुनर्वास अभी बाकी है।
अग्नि प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले परिवारों के सुरक्षित पुनर्वास के लिए बीसीसीएल की ओर से बेलगड़िया और करमाटांड़ में आवासीय व्यवस्था विकसित की गई है। हालांकि, पुनर्वास की प्रक्रिया में कई व्यावहारिक चुनौतियां सामने आ रही हैं। कुछ परिवार अपने पुराने घर और रोजगार से जुड़े होने के कारण स्थानांतरित होने में हिचक रहे हैं, जबकि पुनर्वास की प्रशासनिक प्रक्रिया को लेकर भी लगातार सवाल उठते रहे हैं।
झरिया एक्शन प्लान के तहत भूमिगत आग पर नियंत्रण के साथ प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और क्षेत्र के दीर्घकालिक विकास पर भी जोर दिया जा रहा है। संशोधित झरिया एक्शन प्लान को दिसंबर 2028 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। योजना के तहत आग प्रभावित क्षेत्रों को सुरक्षित बनाने के साथ वहां रहने वाले लोगों को चरणबद्ध तरीके से पुनर्वासित करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है।
धनबाद के कोयलांचल के कई हिस्से लंबे समय से भूमिगत आग की समस्या से प्रभावित रहे हैं। झरिया क्षेत्र के लोदना, बागडेगी, कुजामा, बस्ताकोला, इंडस्ट्री, बेरा, दोबारी, घनुडीह और कुकुरतोफा समेत कई इलाके इसकी चपेट में रहे हैं। वहीं बाघमारा क्षेत्र के कतरास, छाताबाद, मुरायडीह, रामकनाली और तेतुलमारी जैसे इलाकों में भी भूमिगत आग और जमीन धंसने की घटनाएं चुनौती बनी हुई हैं। केंदुआ, गोधर, राजपूत बस्ती, करकेंद और पुटकी सहित अन्य इलाकों में भी भूमिगत आग के प्रभाव की शिकायतें सामने आती रही हैं।
भूमिगत आग से निकलने वाली जहरीली गैसें और जमीन धंसने की घटनाएं स्थानीय आबादी के लिए लंबे समय से चिंता का विषय हैं। ऐसे में शेष अग्नि स्थलों पर जल्द नियंत्रण और प्रभावित परिवारों का सुरक्षित पुनर्वास झरिया के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में शामिल है। दिसंबर 2027 तक सभी शेष अग्नि स्थलों पर काबू पाने और दिसंबर 2028 तक संशोधित झरिया एक्शन प्लान पूरा करने के लक्ष्यों की सफलता इस दिशा में महत्वपूर्ण मानी जाएगी।




