काशी का पिशाच मोचन कुंड, जहां श्राद्ध व तर्पण से पितरों को मिलता है मोक्ष
पितृपक्ष के समय पिशाच मोचन कुंड पर श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान का विशेष महत्व है. कहा जाता है कि पिशाच मोचन कुंड में किए गए श्राद्ध से पितरों को प्रेत योनि से मुक्ति मिलती है और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है।

वाराणसी,उत्तर प्रदेश। सनातन धर्म में पितृपक्ष का विशेष महत्व माना जाता है। 16 दिनों तक चलने वाले इस काल में लोग अपने पितरों की आत्मा की शांति और उनके आशीर्वाद की कामना से तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान करते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, पितृपक्ष के दौरान पितर पृथ्वी लोक पर आते हैं और अपने वंशजों से अन्न-जल ग्रहण करने की अपेक्षा रखते हैं। श्राद्ध पक्ष शुरू होते ही वाराणसी के प्रमुख पितृ तीर्थों पर श्रद्धालुओं की भीड़ जुटने लगी है। पूर्णिमा तिथि को जिन लोगों के पितरों का श्राद्ध होता है, वे भी विशेष रूप से यहां पहुंचकर कर्मकांड करते हैं।
काशी के प्राचीन पिशाच मोचन कुंड पर प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। श्रद्धालु यहां विधि-विधान से पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध कर्म कर अपने दिवंगत परिजनों की आत्मा की शांति की कामना करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि पिशाच मोचन कुंड में श्राद्ध करने से पितरों को प्रेत योनि से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। मान्यता के अनुसार, काशी में मृत्यु को मोक्षदायी माना जाता है, लेकिन पिशाच मोचन कुंड पर पिंडदान और श्राद्ध करने से मृत परिजनों को प्रेत योनि से मुक्ति मिलने की विशेष धार्मिक मान्यता जुड़ी है।
पिशाच मोचन कुंड पर त्रिपिंडी श्राद्ध का भी विशेष महत्व बताया जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार इसमें तीन पिंड बनाए जाते हैं। पहला पितृकुंड पिता के लिए, दूसरा मातृकुंड माता के लिए और तीसरा विमल तीर्थ अन्य दिवंगत परिजनों के लिए माना जाता है। श्रद्धालु इन पिंडों के माध्यम से अपने पितरों का स्मरण करते हुए तर्पण और श्राद्ध कर्म करते हैं। स्थानीय धार्मिक मान्यताओं में इस कुंड को प्रेत बाधा और पितृ दोष से मुक्ति से भी जोड़ा जाता है।
कुंड के समीप स्थित पीपल के पेड़ को लेकर भी कई धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। श्रद्धालुओं के बीच मान्यता है कि यहां सिक्का रखने से पितरों के ऋण और बाधाएं दूर होती हैं तथा उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसी तरह सात्त्विक, राजस और तामस प्रेत बाधाओं से मुक्ति की कामना को लेकर काले, लाल और सफेद झंडे लगाए जाने की परंपरा भी बताई जाती है।
पिशाच मोचन कुंड से जुड़ी एक अन्य धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु ने इस स्थान को पिशाच मोचन का वरदान दिया था। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यहां श्रद्धा और विधि-विधान से स्नान, पूजा, तर्पण तथा पिंडदान करने से जीवन की अशुभ बाधाएं दूर होती हैं और पितरों को शांति मिलती है। इन मान्यताओं के चलते पितृपक्ष के दौरान पिशाच मोचन कुंड पर देश के विभिन्न हिस्सों से लोग पहुंचकर अपने पूर्वजों के लिए श्राद्ध कर्म करते हैं।




