21 साल पुराने किडनी मामले में फिर चर्चा में आईं बिहार की कार्यवाहक डीजीपी प्रीता वर्मा
बिहार में 2005 के चर्चित किडनी कांड के वक्त कार्यवाहक डीजीपी प्रीता वर्मा उसी जिले की एसपी थीं, जहां ये हुआ था। तब तत्कालीन सीएम नीतीश को खुद एक्शन लेना पड़ा था।

पटना,एजेंसी। बिहार की कार्यवाहक पुलिस महानिदेशक प्रीता वर्मा के पदभार संभालने के साथ ही करीब 21 वर्ष पुराना किडनी मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है। वर्ष 2005 में वैशाली की पुलिस अधीक्षक रहते हुए प्रीता वर्मा ने एक रिक्शा चालक की दोनों किडनी कथित रूप से निकाल लिए जाने के मामले में पुलिस कार्रवाई की थी। बाद में इलाज के दौरान रिक्शा चालक की मौत हो गई थी।
घटना 4 दिसंबर 2005 की बताई जाती है। रिपोर्ट के अनुसार वैशाली जिले के महनार निवासी एक रिक्शा चालक पेट में तेज दर्द की शिकायत लेकर एक निजी क्लीनिक पहुंचा था। वहां चिकित्सक ने उसे अपेंडिसाइटिस बताया और उसका ऑपरेशन किया गया। ऑपरेशन के बाद उसकी तबीयत बिगड़ने लगी और वह पेशाब नहीं कर पा रहा था। हालत में सुधार नहीं होने पर 10 दिसंबर को उसे पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भर्ती कराया गया।
पीएमसीएच में चिकित्सकीय जांच के दौरान पता चला कि उसकी दोनों किडनी मौजूद नहीं थीं। गंभीर स्थिति को देखते हुए उसे यूरोलॉजी विभाग में डायलिसिस पर रखा गया। चिकित्सकों ने उसकी जान बचाने के लिए किडनी प्रत्यारोपण की आवश्यकता बताई थी। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के लिए यह उपचार कराना कठिन था। घटना की जानकारी सामने आने के बाद मामले ने व्यापक चर्चा का रूप ले लिया।
उस समय प्रीता वर्मा वैशाली की पुलिस अधीक्षक थीं। रिक्शा चालक की पत्नी की शिकायत के आधार पर महनार थाने में डॉ. आरके गुप्ता और उनके तीन सहयोगियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी। प्राथमिकी में रिक्शा चालक की किडनी कथित रूप से निकाले जाने सहित अन्य आरोप लगाए गए थे। पुलिस की कार्रवाई के बाद हाजीपुर न्यायालय में आवेदन दिया गया, जिसके आधार पर आरोपियों के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किए जाने की जानकारी सामने आई थी।
करीब 20 दिनों तक उपचार के बाद रिक्शा चालक की मौत हो गई। उपलब्ध विवरण के अनुसार वह अपने परिवार का मुख्य कमाने वाला सदस्य था और रिक्शा चलाकर परिवार का भरण-पोषण करता था। घटना के बाद संबंधित चिकित्सक के फरार होने की बात भी सामने आई थी। हालांकि, मामले में लगाए गए आरोपों और संबंधित व्यक्तियों की आपराधिक जिम्मेदारी का अंतिम निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया के अधीन रहा होगा।
प्रीता वर्मा की रिपोर्ट के आधार पर तत्कालीन स्वास्थ्य विभाग ने भी मामले की जांच के आदेश दिए थे। उस समय दीपक कुमार स्वास्थ्य सचिव थे। मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी अधिकारियों से जांच में तेजी लाने और मामले के शीघ्र परीक्षण के निर्देश दिए थे। वर्ष 2005 की इस घटना में तत्कालीन पुलिस अधीक्षक के रूप में प्रीता वर्मा की कार्रवाई का उल्लेख अब उनके कार्यवाहक पुलिस महानिदेशक बनने के बाद फिर से सामने आया है।




