बिजली विभाग में कथित ‘सिस्टम’ पर सवाल, आउटसोर्सिंग और आईडी संचालन को लेकर गंभीर आरोप
संविदा कर्मियों ने उठाई जांच की मांग, लेन-देन और मनमानी तैनाती के आरोपों से मचा हड़कंप

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फतेहपुर/उत्तर प्रदेश। जनपद के बिजली विभाग में संविदा कर्मियों की तैनाती, आईडी संचालन, नए बिजली कनेक्शन तथा आउटसोर्स व्यवस्था को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं। कर्मचारियों और विभागीय सूत्रों का दावा है कि जिले में कथित रूप से एक ऐसा “सिस्टम” संचालित हो रहा है, जिसमें नियमों से अधिक प्रभाव, साठगांठ और लेन-देन को प्राथमिकता दी जा रही है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
कर्मचारियों का आरोप है कि सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं—जैसे झटपट कनेक्शन योजना, ट्यूबवेल कनेक्शन आदि—के नाम पर लंबे समय से कथित अवैध वसूली की जा रही है। उनका कहना है कि बिना “सिस्टम” के कोई भी कार्य सुचारु रूप से नहीं हो पाता।
सूत्रों के अनुसार वर्ष 2025 में एक निजी कंपनी को जिले में आउटसोर्स कार्य का ठेका मिलने के बाद व्यवस्थाओं में बदलाव देखने को मिला। आरोप है कि एक स्थानीय कर्मचारी, जो पहले मीटर रीडर कंपनी में सुपरवाइजर था, विभागीय नजदीकियों के चलते कंपनी में मैनेजर बन गया। इसके बाद संविदा कर्मियों की तैनाती और निष्कासन में कथित मनमानी शुरू हो गई।
कर्मचारियों का दावा है कि 6 जून 2025 को विभिन्न विद्युत उपकेंद्रों से 59 कर्मचारियों को हटाने की सूची तैयार की गई और 20 जून को कई कर्मचारियों की आईडी बंद कर दी गई। उनका कहना है कि हटाए जाने के बाद भी कुछ महीनों तक उनके नाम से भुगतान निकाला गया, जो उनके खातों तक नहीं पहुंचा। इस संबंध में कर्मचारियों ने बैंक स्टेटमेंट और आईडी से जुड़े दस्तावेज होने का दावा किया है। आरोप यह भी है कि संबंधित कार्यालयों में शिकायत करने पर केवल आश्वासन दिए गए। कभी उच्चाधिकारियों को पत्र भेजने की बात कही गई, तो कभी अस्थायी रूप से आईडी चालू कर पुनः बंद कर दी गई। कर्मचारियों का कहना है कि लगभग एक वर्ष तक उन्हें ठोस समाधान नहीं मिला।
फरवरी 2026 में भी आईडी संचालन को लेकर कथित अनियमितताओं के आरोप लगाए गए हैं। कुछ कर्मचारियों का दावा है कि जिन लोगों ने कथित रूप से पैसे दिए, उनकी आईडी पुनः चालू कर दी गई, जबकि अन्य अब भी बाहर हैं।
सूत्रों का यह भी कहना है कि कंपनी का टेंडर समाप्त होने से पहले नई भर्ती की तैयारी चल रही है, जिसमें कथित रूप से ₹50 हजार से ₹1 लाख तक की मांग की जा रही है। हालांकि, इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
कर्मचारियों ने यह भी आरोप लगाया कि हटाए गए कर्मियों के स्थान पर निजी व्यक्तियों से कार्य कराया जा रहा है, जिनके पास कोई अधिकृत रिकॉर्ड नहीं है। कुछ लोगों द्वारा अधिकारियों की आईडी का उपयोग कर ऑनलाइन कार्य करने तक के आरोप लगाए गए हैं। यदि ये आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह गंभीर प्रशासनिक विषय हो सकता है।
वहीं कंपनी प्रबंधन का कहना है कि उनके कार्यकाल में किसी भी कर्मचारी की नई तैनाती नहीं की गई है। इसके विपरीत, कर्मचारियों का दावा है कि उनके पास ऐसे साक्ष्य हैं जो कथित अनियमितताओं को उजागर कर सकते हैं।
सूत्रों के अनुसार हाल ही में एक व्यक्ति द्वारा ऊर्जा निगम के उच्चाधिकारियों को शपथ पत्र के माध्यम से शिकायत भेजकर संबंधित अधिकारियों और कंपनी प्रबंधन की जांच की मांग की गई है। अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या इन गंभीर आरोपों की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच होगी। क्या संविदा कर्मचारियों को न्याय मिलेगा या मामला कागजों में ही सीमित रह जाएगा—इसका जवाब प्रशासनिक कार्रवाई पर निर्भर करेगा।




