हाईकोर्ट ने कहा कि अधिवक्ता कानून तोड़े तो गिरती है पेशे की गरिमा, कानपुर के वकील की जमानत अर्जी खारिज

प्रयागराज/उत्तर प्रदेश। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि कोई अधिवक्ता कानून का उल्लंघन करता है तो वह विधि व्यवसाय की गरिमा को कम करता है। अधिवक्ता न्यायालय का अधिकारी होता है और न्याय प्रशासन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। उसका पेशा उच्चतम नैतिकता, ईमानदारी और कानून के शासन के प्रति अटूट प्रतिबद्धता पर आधारित है। इसी टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति कृष्ण पहल की एकल पीठ ने धोखाधड़ी के आरोप में नामजद कानपुर नगर निवासी अधिवक्ता आशीष शुक्ला की जमानत अर्जी खारिज कर दी।
कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री से प्रथम दृष्टया यह स्थापित होता है कि अपीलार्थी 12वीं की परीक्षा में असफल रहा था, जबकि उसने परीक्षा उत्तीर्ण होने का दावा किया। बोर्ड अधिकारियों की रिपोर्ट में भी उसके फेल होने का उल्लेख है। ऐसे में यह दलील कि केवल 12वीं का प्रमाणपत्र दीमक के कारण नष्ट हो गया, अविश्वसनीय प्रतीत होती है। खासकर तब जब अन्य शैक्षिक अभिलेख सुरक्षित हैं।
कोर्ट ने कहा कि अपीलार्थी ने अग्रिम जमानत दिए जाने के दौरान शर्तों का पालन नहीं किया, जो न्यायिक प्रक्रिया के प्रति उसकी अनदेखी को दर्शाता है। कानपुर बार एसोसिएशन के अध्यक्ष अरिदमन सिंह ने आरोप लगाया है कि आशीष शुक्ला ने जाली शैक्षिक दस्तावेज के आधार पर बार कौंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश में पंजीकरण कराया। इस संबंध में कानपुर नगर कोतवाली में केस दर्ज है।
आरोपी की ओर से दलील दी गई कि उसे साजिशन फंसाया गया है। इससे पहले सेशन जज, कानपुर नगर ने 15 नवंबर 2025 को उसकी अग्रिम जमानत निरस्त कर दी थी। इसी आदेश को उसने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसे खारिज कर दिया गया।हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि यह टिप्पणियां केवल जमानत आवेदन के निपटारे तक सीमित हैं। ट्रायल के दौरान मामले के गुण-दोष पर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। साथ ही ट्रायल कोर्ट को लंबित मुकदमे का शीघ्र निस्तारण करने का निर्देश दिया।

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