महाराष्ट्र में 11 रुपये का आईवी सेट 325 रुपये में बिकने का मामला, निजी अस्पतालों की मनमानी पर एफडीए सख्त
महाराष्ट्र के एफडीए कमिश्नर तुकराम मुंंढे ने हॉस्पिटल में इस्तेमाल किए जाने वाले आइटम्स की ऊंची एमआरपी की तरफ ध्यान खींचा है। मेडिकल डिवाइसेस की कीमत पर लगाम करने के लिए मुंढे ने राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण पत्र लिखा ताकि हॉस्पिटल के बिल को कम किया जा सके। आमतौर पर एक मेडिकल बिल में इसकी हिस्सेदारी 30 से 50 फीसदी तक होती है।

मुंबई,एजेंसी। महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने निजी अस्पतालों में मरीजों को चिकित्सा सामग्री ऊंची कीमतों पर उपलब्ध कराए जाने के मामलों को लेकर सख्त रुख अपनाया है। होटल-रेस्तरां में खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और स्वच्छता को लेकर कार्रवाई के बाद अब महाराष्ट्र के एफडीए आयुक्त तुकाराम मुंढे ने अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली चिकित्सा सामग्री की कीमतों और मरीजों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ को लेकर नीति स्तर पर पहल की है।
एफडीए के अध्ययन में चिकित्सा क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाली कुछ सामग्री की खरीद कीमत और अस्पतालों द्वारा मरीजों से वसूली जाने वाली राशि में बड़ा अंतर सामने आने की बात कही गई है। उदाहरण के तौर पर करीब 11 रुपये कीमत वाला आईवी सेट अस्पतालों में लगभग 325 रुपये तक में बेचे जाने का मामला सामने आया है। इसी तरह 40 से 50 रुपये कीमत वाले नेबुलाइजर या ऑक्सीजन मास्क के लिए मरीजों से करीब 650 से 715 रुपये तक वसूले जाने की जानकारी दी गई है। कैथेटर और आईवी कैनुला जैसी अन्य चिकित्सा सामग्री की कीमतों में भी उल्लेखनीय अंतर पाए जाने की बात कही गई है।
एफडीए आयुक्त तुकाराम मुंढे ने इस संबंध में राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण के समक्ष एक नीति प्रस्ताव रखे जाने की जानकारी दी है। प्रस्ताव में अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली प्राथमिक चिकित्सा सामग्री और उपभोग्य वस्तुओं को औषधि मूल्य नियंत्रण व्यवस्था के दायरे में लाने की मांग की गई है। उनका कहना है कि चिकित्सा सामग्री की कीमतों में अत्यधिक अंतर का सीधा असर उपचार करा रहे मरीजों और उनके परिवारों पर पड़ता है।
मुंढे के अनुसार, महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने पिछले तीन महीनों में दवा कंपनियों के 2,485 निरीक्षण किए हैं, जिनमें 230 लाइसेंस निलंबित किए गए। इसके अलावा औषधि दुकानों और विक्रेताओं के 11,780 निरीक्षण किए गए, जिनके बाद 2,075 लाइसेंस निलंबित और 394 लाइसेंस रद्द किए गए।
तुकाराम मुंढे ने सोशल मीडिया पर अस्पतालों के बिल को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि अस्पताल के बिल का सबसे महंगा हिस्सा संभवतः कभी अस्पताल तक पहुंचा ही नहीं। उनके इस बयान को अस्पतालों में चिकित्सा सामग्री की कीमतों और मरीजों से वसूली जाने वाली राशि के बीच अंतर को लेकर उठाए गए सवालों से जोड़कर देखा जा रहा है।
एफडीए की इस पहल का उद्देश्य चिकित्सा उपचार के दौरान इस्तेमाल होने वाली आवश्यक सामग्री की कीमतों में पारदर्शिता बढ़ाना और मरीजों पर पड़ने वाले अनावश्यक आर्थिक बोझ को कम करना है। हालांकि, प्रस्तावित व्यवस्था और उसके संभावित प्रभावों को लेकर अंतिम निर्णय संबंधित केंद्रीय प्राधिकरण और सरकार की नीति प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट होगा।
तुकाराम मुंढे महाराष्ट्र कैडर के 2005 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी हैं। वह प्रशासनिक स्तर पर कड़े रुख और नियमों के पालन को लेकर चर्चा में रहे हैं। उन्होंने डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाड़ा विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर की पढ़ाई की है। प्रशासनिक कार्यशैली के कारण उन्हें अक्सर सख्त अधिकारी के तौर पर वर्णित किया जाता है।




