अब घूस लेने पर नहीं बचेंगे सरकारी ऑफिसर,रिश्वत मांगने के आरोप की जांच के लिए पूर्व मंजूरी जरूरी नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि लोक सेवक के खिलाफ रिश्वत मांगने के आरोप की जांच के लिए पूर्व मंजूरी की आवश्यकता नहीं है।

नई दिल्ली,एजेंसी। सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी लोक सेवक पर रिश्वत मांगने का आरोप होने पर जांच शुरू करने के लिए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए के तहत पूर्व मंजूरी लेना आवश्यक नहीं है। अदालत ने कहा कि रिश्वत मांगना आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन का हिस्सा नहीं है, इसलिए ऐसे कृत्य को इस प्रावधान के तहत मिलने वाला संरक्षण प्राप्त नहीं हो सकता।
न्यायमूर्ति एसवीएन भट्टी और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की पीठ ने 16 अक्टूबर को यह फैसला सुनाते हुए राजस्थान पुलिस के कांस्टेबल तेजाराम की अपील खारिज कर दी। कांस्टेबल ने अपने खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले में आरोप तय किए जाने को चुनौती दी थी। शीर्ष अदालत ने राजस्थान हाई कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें निचली अदालत के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार किया गया था।
पीठ की ओर से फैसला लिखते हुए न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया ने स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए का उद्देश्य लोक सेवकों के आधिकारिक कार्यों के निर्वहन के दौरान लिए गए फैसलों या की गई सिफारिशों से संबंधित कुछ मामलों में जांच के लिए पूर्व मंजूरी की व्यवस्था करना है। रिश्वत मांगने जैसे कथित अपराध को आधिकारिक कर्तव्य का हिस्सा नहीं माना जा सकता। अदालत ने अपने निष्कर्ष के समर्थन में पूर्व के न्यायिक फैसलों का भी उल्लेख किया।
मामले के अनुसार, तेजाराम सिरोही में पुलिस उपाधीक्षक कार्यालय में तैनात था। 22 अप्रैल, 2021 को एक अन्य कांस्टेबल देवेंद्र कुमार ने ई-मेल के माध्यम से शिकायत की थी कि तेजाराम ने पुलिस अधीक्षक की ओर से 1.5 लाख रुपये की मांग की थी। शिकायत के आधार पर चार जून, 2021 को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7ए और भारतीय दंड संहिता की धारा 120बी के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई। तेजाराम को एक सितंबर, 2021 को गिरफ्तार किया गया था।
आठ दिसंबर, 2023 को अभियोजन की मंजूरी मिलने के बाद 19 जनवरी, 2024 को आरोप-पत्र दाखिल किया गया। पाली की विशेष अदालत ने 12 सितंबर, 2024 को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा सात के तहत तेजाराम के खिलाफ आरोप तय किए। इसके बाद उसने राजस्थान हाई कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन 26 मार्च, 2025 को उसकी पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी गई। इसके बाद कांस्टेबल ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
तेजाराम की ओर से दलील दी गई थी कि जांच एजेंसी ने धारा 17ए के तहत आवश्यक पूर्व मंजूरी नहीं ली थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया और आरोप तय करने के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा सात उन लोक सेवकों से संबंधित है, जो सार्वजनिक कर्तव्य के अनुचित निर्वहन के बदले रिश्वत या अन्य अनुचित लाभ स्वीकार करते हैं, लेने का प्रयास करते हैं या उससे संबंधित आचरण करते हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से स्पष्ट होता है कि आधिकारिक निर्णयों से जुड़े मामलों में लागू पूर्व मंजूरी की शर्त को रिश्वत मांगने के आरोपों की जांच रोकने के लिए सामान्य संरक्षण के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

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