मुंबई में 12 साल के बच्चे ने मां की देखभाल के लिए छोड़ दी पढ़ाई, इलाज के लिए जुटा रहा पैसे

मुंबई/एजेंसी। जहां 12 साल के ज्यादातर बच्चे होमवर्क और क्रिकेट के खेल में व्यस्त रहते हैं, वहीं परवेज अली का पूरा दिन अस्पताल के वार्डों के बाहर अजनबियों से अपनी मां की जान बचाने की गुहार लगाने में बीतता है। मूल रूप से उत्तर प्रदेश के फैजाबाद के रहने वाले इस छोटे से बच्चे ने अपनी बीमार मां को मुंबई लाने का फैसला तब किया, जब उसके पिता और अन्य रिश्तेदारों ने लंबी बीमारी के दौरान मां को बेसहारा छोड़ दिया। अली बताते हैं कि जब हमारे गांव के डॉक्टरों ने पिता जी से कह दिया कि वे मां का इलाज नहीं कर सकते, तो उन्होंने उसे यूपी के किसी बड़े अस्पताल ले जाने के बजाय घर में ही तड़पने के लिए छोड़ दिया। बाद में वे मां को घर से निकालने की बात करने लगे।
मां मुझे फोन करके रोती थी कि वह बहुत दर्द में है और बार-बार कहने के बाद भी पिता उसे डॉक्टर के पास नहीं ले जा रहे। तभी मैंने तय किया कि मैं उन्हें यहां मुंबई ले आऊंगा। मैंने अपने चॉल के कई लोगों को केईएम (KEM) अस्पताल जाते देखा था, जहां मैं अपनी नानी के साथ रहता हूं।” अली 2024 में अपनी मां शबाना को मुंबई लेकर आए थे। शबाना का दो साल पहले केईएम अस्पताल में कोलोस्टोमी का ऑपरेशन हुआ था। अली का आरोप है कि उसके बाद वहां के डॉक्टरों ने आगे इलाज करने से मना कर दिया। अ
अली ने बताया, “डॉक्टरों ने कहा कि वे मां को और अधिक समय तक अस्पताल में नहीं रख सकते क्योंकि हम भुगतान करने में असमर्थ हैं और उनके पास उनकी लगातार देखरेख के लिए पर्याप्त स्टाफ नहीं है। उन्होंने हमसे अपनी मर्जी से डिस्चार्ज पर साइन करवाए, जिस पर मेरी नानी ने दस्तखत किए। उन्होंने मेरी मां को ऐसी हालत में डिस्चार्ज कर दिया जब उनके अंग शरीर के बाहर एक बैग में थे।” इसके बाद अली अपनी मां को एंटॉप हिल ले गया, जहां वह और उसकी नानी रहते हैं।
शबाना ने परवेज़ को तब अपनी मां के पास मुंबई छोड़ दिया था जब वह सिर्फ तीन साल का था। वह वडाला के एक बीएमसी स्कूल में चौथी कक्षा में पढ़ रहा था, तभी उसे अपनी मां के इलाज के लिए भाग-दौड़ करनी पड़ी। शबाना कहती हैं, “मेरा बेटा ही मेरा इकलौता सहारा है। मेरी मां अपनी उम्र और सेहत के हिसाब से जितनी मदद कर पाती हैं, करती हैं। हमें किसी और का सहारा नहीं है। परवेज सिर्फ 12 साल का है, लेकिन उसने एक बड़े वयस्क की तरह जिम्मेदारी उठाई है। मैं हैरान हूं कि उसने फैजाबाद से मुंबई तक के सफर और फिर इन अस्पतालों में मुझे भर्ती कराने की सारी जानकारी कैसे जुटाई। हर दिन अस्पताल के बिस्तर पर लेटे हुए मैं यही सोचती रहती हूं कि मेरा छोटा सा बच्चा मेरे हर ऑपरेशन और इलाज के लिए पैसों का इंतजाम कैसे कर रहा होगा।”
हालांकि, इस स्थिति ने परवेज की पढ़ाई पर बुरा असर डाला है। पारिवारिक सहयोग न होने के कारण उसे स्कूल छोड़ना पड़ा। अली ने बताया, “मैंने पिछले साल से स्कूल जाना पूरी तरह बंद कर दिया है। मेरे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है क्योंकि सारे फैसले मुझे ही लेने होते हैं, मदद के लिए यहां-वहां दौड़ना पड़ता है और मां की देखभाल के लिए उनके पास बैठना पड़ता है। स्कूल जाने का समय ही कहां है? मैं बस दुआ करता हूं कि हमें कुछ मदद मिल जाए और मां जल्द ठीक हो जाएं, ताकि मैं दोबारा पढ़ाई शुरू कर सकूँ और इतना काबिल बनूं कि हमारे लिए दो वक्त की रोटी कमा सकूं।”
इलाज कर रहे एक डॉक्टर ने बताया, “उन्हें ‘रेक्टो-यूरेथ्रल फिस्टुला’ और ‘रेक्टोवैजाइनल फिस्टुला’ के लिए यहां भर्ती किया गया है। पहले इलाज करने वाले डॉक्टरों को इलाज बीच में नहीं छोड़ना चाहिए था, क्योंकि ऐसे मामलों में जोखिम देखते हुए मरीजों को बाद में स्वीकार करना मुश्किल होता है। लेकिन लड़के ने इतनी मिन्नतें कीं कि प्रशासन इस स्थिति के प्रति अमानवीय नहीं हो सका। फिलहाल उन्हें एक जटिल सर्जरी की जरूरत है।
सायन अस्पताल में इलाज रियायती दरों पर होता है, फिर भी कुछ राशि का भुगतान करना होगा। सर्जरी की जटिलता को देखते हुए हमें एक निजी अस्पताल के डॉक्टर को बुलाना होगा। हालांकि वह डॉक्टर बहुत कम फीस लेने पर राजी हो गए हैं, फिर भी लड़के को 60,000 रुपये जमा करने होंगे। इसके अलावा, आने वाले महीनों में शबाना की कई और सर्जरी होंगी, जिनका कुल खर्च कम से कम 1.5 से 2 लाख रुपये तक आएगा।”

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button