जीडीए के बाबुओं और बिल्डर के बीच करोड़ों रुपये के बाह्य विकास शुल्क को लेकर मिलीभगत का सामने आया मामला

बिल्डर पर 5 करोड़ बकाया, बाबू-जेई ने दबा रखी थी फाइल

गाजियाबाद। जीडीए के बाबुओं और बिल्डर में मिलीभगत का एक और मामला सामने आया है। एक बिल्डर पर वाह्य विकास शुल्क के नाम पर 5 करोड़ 89 लाख रुपये का बकाया था। इस मामले में हाई कोर्ट ने एलिवेटेड रोड और मेट्रो सेस के पैसे को गलत बताया था जबकि वाह्य विकास शुल्क के बारे में कुछ भी नहीं कहा गया था। 2020 में यह आदेश हुआ था। तब से लेकर अब तक यह फाइल दबी रही। किसी अधिकारी और कर्मचारी ने इसे आगे नहीं बढ़ाया। पिछले दिनों जब ऑडिट आपत्ति की शासकीय समिति के सामने सुनवाई हो रही थी तो यह मामला उठा। जीडीए वीसी अतुल वत्स ने जब फाइल को चेक किया तो पता चला कि इसमें संबंधित बाबू और जूनियर इंजीनियर की लापरवाही है।
हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ जीडीए को सुप्रीम कोर्ट में जाना चाहिए था। मेट्रो और एलिवेटेड रोड सेस को छोड़कर बाकी पैसे को जमा करवाने के लिए बिल्डर को डिमांड नोटिस दिया जाना था। ऐसा कुछ भी नहीं किया गया। इसमें संबंधित बाबू और जूनियर इंजीनियर की लापरवाही के चलते उन्हें विशेष प्रतिकूल प्रविष्टि दिए जाने का आदेश दिया गया है। साथ ही बिल्डर को हाई कोर्ट के आदेश के क्रम में डिमांड नोटिस देने का आदेश दिया गया है।
मेसर्स वीवीआईपी इन्फ्रा होम लिमिटेड को जीडीए की तरफ से वाह्य विकास शुल्क जमा करवाने का डिमांड भेजा गया था। इसमें जीडीए ने मेट्रो और एलिवेटेड रोड सेस को जोड़ दिया था। 2017 में बिल्डर ने हाई कोर्ट में केस दायर यह कहते हुए कहा कि नियमों के खिलाफ जाकर जीडीए शुल्क ले रहा है। इसमें मेट्रो सेस और एलिवेटेड सेस का विरोध किया गया था। इसके अलावा 1.5 से 2.5 एफएआर (फ्लोर एरिया रेशियो) का भी विरोध किया था। इस पर हाई कोर्ट ने 2020 में बिल्डर के पक्ष में आदेश दिया।
राजनगर एक्सटेंशन में चल रहा है विवाद
राजनगर एक्सटेंशन के बिल्डर और बायर्स के बीच वाह्य विकास शुल्क का लंबे समय से विवाद चल रहा है। बिल्डरों का तर्क है कि शासन की तरफ से 2.5 एफएआर को फ्री दिए जाने का आदेश हुआ है। जीडीए इसे लागू नहीं कर रहा है। इस संबंध में कोई आदेश नहीं है। इस संबंध में बिल्डर के पक्ष में फैसला आ चुका है। जीडीए ने इसे हाईकोर्ट में रिव्यू दाखिल कर रहा है। इसकी वजह से मामला अभी कोर्ट में है। इसकी वजह से जीडीए का 300 करोड़ रुपये से अधिक राजनगर एक्सटेंशन का वाह्य विकास शुल्क बकाया होने की बात कही जाती है।

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