यहां कोई मर जाए तो हो जाती है टेंशन, घर में ही दफनानी पड़ती है डेड बॉडी

भीलवाड़ा,(राजस्थान)। परिवार में किसी के बीमार होने पर उसके स्वास्थ्य लाभ की कामना से अधिक उसकी मोत होने पर शव को दफ़नाने के लिए जगह की चिंता सताने लगती है। यह कहने और सुनने में भले ही अजीब लगे, मगर राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में ऐसा दिखता है। यहां एक ऐसा संप्रदाय है, जिसमें किसी परिजन के बीमार होने पर यह चिंता सताने लगती है कि यदि किसी की मौत हो गई तो इसके शव को ज़मीन में दफ़नाकर समाधि कहां देंगे। जगह की तलाश उनके लिए एक बड़ी चिंता बनकर उभर कर आती है।

गरीबी में जीवन यापन करते हैं नाथ संप्रदाय के लोग

गरीबी में जीवन यापन करते हैं नाथ संप्रदाय के लोग

यह कहानी है भीलवाड़ा जिले के माण्डल सुवाणा और करेड़ा ब्लॉक में रहने वाले कालबेलिया समाज के लोगों की, जो नाथ संप्रदाय से ताल्लुक रखते हैं। ये लोग भीख मांगकर और सांप पालकर अपना जीवन यापन करते हैं।

श्मशान की जमीन पर दबंगों का कब्जा

श्मशान की जमीन पर दबंगों का कब्जा

इस समुदाय में परिजनों की मौत हो जाने पर उनका दाह संस्कार नहीं कर उसे समाधि दी जाती है। लेकिन उसके लिए उनके गांव में समुचित श्मशान नहीं है। कुछ जगहों पर राज्य सरकार ने भूमि तो आवंटित कर दी, मगर अभी भी वहां दबंगों का कब्जा है। ऐसी स्थिति में यह लोग कई बार अपने घरों में ही अपने परिजनों को दफ़ना कर समाधि देते हैं।

समाधि के लिए नहीं नसीब हुई श्मशान

समाधि के लिए नहीं नसीब हुई श्मशान

कालबेलिया समाज के समाज सेवी पूनम नाथ कालबेलिया बताते हैं कि 2 महीने पहले बदनोर उपखंड के परा गांव के रहमत नाथ की पत्नी शृंगी देवी की मौत हो गई थी। उसे गांव के श्मशान में समाधि नसीब नहीं हुई। वह जिस मकान में रह रही थी उसे उसी में दफ़नाकर समाधि देनी पड़ी। यही हालात चाखेड गांव के पूनम नाथ की दुर्घटना में मौत हो जाने पर गांव में श्मशान नहीं होने पर 25 किलोमीटर दूर माण्डल कस्बे के श्मशान में समाधि देनी पड़ी।

40 गांव में केवल एक श्मशान

40 गांव में केवल एक श्मशान

मरने के बाद दो गज जमीन भी नसीब नहीं होने की कहानी यहीं समाप्त नहीं होती है। यही कहानी धुवाला गांव में भेरुनाथ की पत्नी की मौत हो जाने पर उन्हें घर में ही दफ़नाया गया। पूनम नाथ बताते हैं कि करेड़ा उपखंड के 30 गांव में सुवाना ब्लॉक के 40 गांवों जिसमें अकेले चिताम्बां में फ़ूनद राव करेड़ा चाखेंड पाटन पारा जैसे कई गांव हैं, जिसमें हमारे समाज के लोग बड़ी संख्या में रहते हैं, पर सबके सामने जीते जी सड़क बिजली पानी की सुविधा से अधिक तकलीफ मरने के बाद दफ़नाने के लिए दो गज जमीन की है।

श्मशान के लिए गांव से दूर मिली जमीन

श्मशान के लिए गांव से दूर मिली जमीन

पूनम नाथ बताते हैं कि कुछ गांव में हमारे श्मशान है, मगर बाकी गांव के लिए प्रशासन ने नदी किनारे 5 से 10 किलोमीटर दूर जमीन तो आवंटित कर दी है, मगर वहां दबंगों के कब्जे हैं। जहां वह खेती करते हैं ऐसे में हम अपने परिजनों की मौत के बाद आखिर उनको दफ़नाये कहां यह सबसे बड़ा सवाल है। अभी हाल ही फांदरास गांव में श्मशान की जमीन नदी किनारे 6 किलोमीटर दूर दी गई है। वहां अर्थी लेकर कैसे पहुंचे।

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