मुंबई की दीपिका दमाणी घर-घर से रद्दी इकट्ठा कर संवार रहीं गरीबों और बेसहारों का जीवन

मुंबई/एजेंसी। अपने बचपन में भूख, गरीबी और मूलभूत जरूरतों की जद्दोजहद के साथ दीपिका दामानी का जीवन भी बहुत कठिन रहा, लेकिन अपने निजी अभावों और पारिवारिक संस्कारों ने उन्हें बचपन से ही समाज सेवा, संवेदनशीलता और सहिष्णुता का पाठ पढ़ाया। कुछ किलो रद्दी इकट्ठा करने से शुरू हुआ समाज सेवा का ये सफर आज लाखों टन रद्दी इकट्ठा करने के मुकाम तक पहुंच चुका है। रद्दी से अंसख्य महिलाओं, युवाओं और वंचितों को सपोर्ट करने वाली दीपिका का अरहम सेवा ग्रुप अपने इस अभूतपूर्व काम के लिए लिम्का बुक ऑफ रेकॉर्ड में अपना नाम दर्ज करा चुका है। रद्दी इकट्ठा करने का ये काम सिर्फ मुंबई ही नहीं, बल्कि देश के दूसरे 60 हिस्सों तक फैल चुका है।

​अपना पेट काट कर भूखों को खिलाया​

​अपना पेट काट कर भूखों को खिलाया​

दीपिका का बचपन अमरावती में अभावों के बीच बीता। वे कहती हैं, ‘मैं अमरावती में पली-बढ़ी हूं। हमारे परिवार की आर्थिक स्थिति काफी कमजोर थी। मेरे पिता मिल में छोटी-सी नौकरी करते थे। हम चार भाई-बहनों की जिम्मेदारी पिता पर थी, मां घर के काम करती थी। मगर मेरी दादी ने हमेशा बड़ी हिम्मत रखी। उन्होंने दूसरों के घर रोटी और रसोई बनाने से लेकर, होटल के लिए दालें पीसने, अगरबत्ती, धूपबत्ती के पैकेट बनाने जैसे छोटे-छोटे काम किए, ताकि घर में चार पैसे आ सकें, इसके बावजूद भूख और मूलभूत जरूरतों को लेकर जद्दो-जेहद बनी रहती थी। अभाव का आलम हमेशा रहा, मगर हममें दया, अनुकंपा और करुणा के संस्कार हमेशा रहे। यही वजह है कि स्वयं वंचित होने के बावजूद हम महीने में एक बार घर पर 25-50 रोटियां और सब्जी बनाकर भूखे और जरूरतमंदों को खाना खिलाते थे।

​2005 से आया टर्निंग पॉइंट​

दीपिका कहती हैं, ‘आपको याद होगा 2005 में मुंबई में बाढ़ आई थी। उसी के बाद मुलुंड में आयोजित चातुर्मास में हमारे गुरुजी ने देखा कि कई युवाओं ने मुंबई की बाढ़ में लोगों की मदद की और बाढ़ के बाद भी उनकी समाज सेवा जारी है। अरहम युवा सेवा ग्रुप से जुड़कर मुझे प्रेरणा मिली कि मैं रद्दी इकट्ठा करके असहाय और जरूरतमंदों की सहायता करूं। मैं 2008 में इस ग्रुप से जुड़ी। राष्ट्र संत परम गुरुदेव नम्रमुनि की प्रेरणा से हमने रद्दी जमा करनी शुरू की।

​’लोग दरवाजे से भगा देते थे’​

​लोग दरवाजे से भगा देते थे​

रद्दी जमा करने के पीछे दो उद्देश्य थे। पहला रद्दी इकट्ठा करके उसे बेचकर जरूरतमंदों की सहायता करना दूसरा घर-घर जाकर रद्दी मांग कर अपनी ईगो को जीरो करना। हम लोग मुंबई की बड़ी-बड़ी इमारतों और सोसाइटीज में जाते और रद्दी मांगते। कई बार तो हमें भगा दिया जाता। कई लोग मुंह पर दरवाजा बंद कर देते। हमारा मजाक उड़ाया जाता, हमें अपमानित किया जाता। काफी मेहनत करनी पड़ती थी। कई बार लोग ये भी कहते कि हम आपको रद्दी क्यों दें? रद्दी बेचकर सब्जी न खरीदें। हमें उन्हें समझाना पड़ता था कि इस रद्दी को देने से आपको कोई फर्क नहीं पड़ेगा, मगर कई जरूरतमंदों का जीवन संवर जाएगा। अनगिनत चुनौतियों के बाद रद्दी इकट्ठा होनी शुरू हुई।’

मुंबई की झुग्गी-झोपड़ियों में मुस्कान​

​मुंबई की झुग्गी-झोपड़ियों में मुस्कान​

दीपिका कहती हैं, ‘कुछ किलो रद्दी से शुरुआत हुई, फिर वह हजारों में तब्दील हुई और अब तो हम लाखों टन रद्दी इकट्ठा कर चुके हैं। मुंबई में मुलुंड के पास झुग्गी-झोपड़ी, घाटकोपर का स्लम एरिया, कंस्ट्रक्शन वर्कर्स, कांदिवली, मालाड, बोरीवली, विलेपार्ले, कोपरखैरने और कल्याण के ग्रामीण इलाकों से रद्दी एकत्रित कर हमने उन्हीं इलाकों के बच्चों और युवाओं के कल्याण के लिए काम किया है। सालाना तीस हजार स्टूडेंट्स को शिक्षा में सहयोग प्रदान कर रहे हैं। हर शनिवार को जरूरतमंदों को भोजन करवाते हैं। पढ़ाई -लिखाई के साथ-साथ हम झुग्गी-झोपड़ी के बच्चों को मोरल वैल्यूज की क्लासेज भी देते हैं। आज अलग-अलग राज्यों में हमारे 60 केंद्र हैं, जो रद्दी अभियान को आगे बढ़ा रहे हैं।
महिला सशक्तिकरण का बिगुल​

​महिला सशक्तिकरण का बिगुल​

हर साल दीपिका दामानी का अरहम युवा सेवा ग्रुप 15 मार्च से 15 अप्रैल तक रद्दी इकट्ठा करने का विशेष अभियान चलाता है। दीपिका कहती हैं, ‘इस अवधि में हम जो रद्दी इकट्ठा करते हैं, उन्हें रूरल एरिया के बच्चों को शिक्षित करने में लगाते हैं। समाज में कई महिलाएं हैं, जो शिक्षित नहीं हैं। ऐसी महिलाओं को हम उनके कौशल के हिसाब से चीजें सिखाते हैं, ताकि वे पैसे कमा सकें। घाटकोपर में हमने महिलाओं को पेपर बैग, वडी, पापड़, थेपले बनाने और सिलाई का भी प्रशिक्षण दिया है। मुंबई में हम साल भर में तकरीबन एक हज़ार से ज्यादा महिलाओं को विभिन्न कौशल में प्रशिक्षत करके आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास करते हैं।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button