शल्लेश्वर मंदिर में हर साल चावल के दाने जितना बढ़ रहा शिवलिंग!

हमीरपुर/उत्तर प्रदेश। हमीरपुर जिले में सैकड़ों साल पुराने शिवमंदिर में सावन मास के पहले सोमवार की धूम मच गई है। इस मंदिर में शल्लेश्वर महादेव का शिवलिंग स्थापित है, जिसके गर्भ में करीब 870 सालों का इतिहास छिपा है। हर साल शिवलिंग चावल के दाने जितना लगातार बढ़ रहा है। आज कांवड़ियों ने भगवान भोलेनाथ के शिवलिंग का जलाभिषेक किया। वहीं यहां श्रद्धालुओं का मंदिर में तांता लगा हुआ है।
बुंदेलखंड के हमीरपुर जिला मुख्यालय से करीब पचासी किमी दूर सरीला कस्बे में शल्लेश्वर मंदिर में आज से सावन मास की धूम शुरू हो गई है। सरीला कस्बा आजादी के पहले रियासत थी। यहां के समाजसेवी महेन्द्र सिंह राजपूत ने बताया कि सरीला क्षेत्र महाभारत काल में भी अस्तित्व रहा है। बुंदेलखंड में यह क्षेत्र सबसे पिछड़ा माना जाता रहा है। प्राचीन मंदिरों के अतीत मेंं विशालकाय शिव लिंग यहां शल्लेश्वर मंदिर में विराजमान है। इसकी तुलना कोटेश्वर और लोधेश्वर समेत तमाम शिवमंदिरों से आज भी होती है।
देवनगरी भाषा में एक शिलालेख
यहां शिवालय की दीवालों में संवत 1202 की देवनगरी भाषा में एक शिलालेख लगी है, कोई भी इस भाषा को समझ नहीं पाया है। मंदिर में ही शिल्लसेन, प्रवर्धिता लिखा शिलालेख भी लगा है। इसका अर्थ भी समझ से परे है। सावन मास को लेकर इस मंदिर को खूब सजाया गया है। रंग रोशन और झिलमिल लाइटों से मंदिर और पूरे परिसर को संवारा गया है। सावन मास के पहले सोमवार को सुबह से बड़ी संख्या में लोगों ने जलाभिषेक कर पूजा की। तमाम कांवड़ियों ने भी महादेव के शिवलिंग का जलाभिषेक किया।
गुप्तकाल और चंदेलकाल के बीच बना था यह शिवालय
हमीरपुर के साहित्यकार एवं तमाम पुस्तके लिखने वाले डॉ. भवानीदीन प्रजापति ने बताया कि सरीला में शल्लेश्वर शिवालय बड़ा ही विशालकाय और अद्धभुत है। यहां मंदिर का मठ देखकर लगता है कि यह गुप्तकाल और चंदेलकाल के मध्य बनाया गया होगा। मगर शिवलिंग देखने से यह स्पष्ट होता है कि यह मंदिर चंदेलों के शासनकाल से पहले बनाया गया है। मठ में गुंबद और दीवार होने से मंदिर बहुत ही सुंदर दिखता है। बताया कि सरीला स्टेट की वंशावली महाराज छत्रसाल से प्रारंभ हुई थी।
चर्म रोग से निजात
समाजसेवी महेन्द्र सिंह राजपूत ने बताया कि इस मंदिर का विस्तार यहां के नरेश शिल्लसेन ने कराया था। सिर्फ चूना और कंकरीट सेनिर्मित यह शिवालय आज भी मजबूती का बेमिसाल है। मंदिर का निर्माण भी चंदेल कालीन तेलीय पत्थरों से कराया गया है। बताया कि मंदिर के निकट एक तालाब है, जिसके किनारे शल्हऊ कुआं बना है। मंदिर से तालाब और कुआं आपस में अंडरग्राउंड सुरंग जरिए जुड़े है। ऐसी मान्यता है कि कुआंका थोड़ा सा जल पीने से चर्मरोग बीमारी से निजात मिलती है।




