कश्मीर में बदल रही आम कश्मीरियों की सोच-मानसिकता
आतंकवाद और अलगाववाद को माना जा रहा अपशब्द

श्रीनगर/एजेंसी। कश्मीर घाटी में बेशक आतंकवाद और अलगाववाद का पारिस्थितिक तंत्र किसी हद तक बचा हुआ है, लेकिन आम कश्मीरियों की मानसिकता अब बदल चुकी है। कल तक आतंकियों और अलगाववादियों के साथ अपना नाम जोड़कर, समाज में खुद को विशिष्ट साबित करने की होड़, आतंकियों और पाकिस्तान विरोधियों को कौम व इस्लाम का दुश्मन बताने, उनके सामाजिक बहिष्कार की मानसिकता अब दम तोड़ चुकी है। स्थिति यह है कि अगर किसी कोई रिश्तेदार आतंकी है या आतंकी था,या किसी की पृष्ठभूमि आतंकवाद और अलगाववाद से संबधित है तो वह उसे छिपाने का प्रयास करता है। अगर किसी कोई रिश्तेदार कभी राष्ट्रविरोधी रहा है तो वह उससे अपना रिश्ता सार्वजनिक नहीं करता। अब आम कश्मीरी खुद को मुख्यधारा का एक अटूट हिस्सा साबित करता है।
जम्मू कश्मीर में 1989 से जारी आतंकी हिंसा और अलगाववाद के दुष्चक्र के दौरान, मौजूदा दौर में पहली बार आम लोग आतंकवाद या अलगाववाद िकी तुलना एक अपशब्द,एक अभिषाप के साथ करते नजर अाते हैं। कश्मीर में जब आतंकी हिंसा शुरु हुई तो एक बड़ा वर्ग आतंकियों को अपना नायक, इस्लाम का सिपाही और मुजाहिद बताते हुए उनका महिमांमंडन करता था। कोई उनके खिलाफ नहं बोल सकता था।
अब आतंकियों के जनाजों में शामिल होना भी जरुरी नहीं
आतंकियों के जनाजों में शामिल होना भी जरुरी होता था। आतंंकियों और उनके परिजनों द्वारा उनकी तस्वीरे और वीडियो साझा किए जाते थे। अगर कोई आतंकी मारा जाता तो अन्य आतियों द्वारा उसे सलामी दी जाती थी। सुरक्षाबलों का सहयोग करने वालों से लेकर आतंकियों का विरोध करने वालों को नाबिद, नाबदू जैसे शब्दों को इस्तेमाल किया जाता, उन्हें मुखबिर और इस्लाम का दुश्मन बताया जाता है।अगर आतंकी उनकी हत्या करते तोउनके जनाजे मं शामिल होने से भी उनके करीबी रिश्तेदार और पड़ोसी परहेज करते थे।
पाकिस्तान के लिए वह सिर्फ एक बलि का बकरा
पांच अगस्त 2019 के बाद से इस मानसिकता में लगातार बदलाव आया है। रक्षा मामलों के रमीज मखदूमी ने कहा कि इसका मुख्य कारण आतंकवाद, अलगाववाद और पाकिस्तान से आम कश्मीरियों का मोह भंग होना है। आम कश्मीरी को समझ आ चुका है कि पाकिस्तान के लिए वह सिर्फ एक बलि का बकरा हैं जिनका इस्तेमाल वह हिंदुस्तान के खिलाफ अपनी दुश्मनी निकालने के लिए कर रहा है।
इसके अलावा बीते कुछ वर्षाें के दौरान जिस तरह से उपराज्यपाल मनोज सिन्हा के दिशा निर्देश में प्रशासनिक तंत्र में बैठे आतकियों के समर्थकों को नौकरी से निकाला जा रहा है, उन्हें बेनकाब किया जा रहा है, उसका भी असर है। इसके अलावा जिस तरह से प्रशासन ने आतंकियो ंऔर उनके परिजनों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई में तेजी लाई है, उनकी सपत्तियों काे कुर्क करने, पुराने आतंकी मामलों की जांच को फिर से शुरु किया है, उसका भी असर हाे रहा है।
आतंकियों का नाम लेने से परहेज करते हैं लोग
यही कारण है कि आज यहां काई आतंकियों का महिमा मंडन करना तो दूर, सार्वजनिक तौर पर उनका नाम तक लेने से परहेज करता है। उन्हाेंने कहा कि सरकारी नौकरी के लिए भी अब पुलिस जांच पहले से कहीं ज्यादा सख्त है,पासपोर्ट के लिए भी अब नियमों को सख्ती से पालन हो रहा है, अगर कहीं काई आतंकी या अलगाववादी कनेक्शन मिलता है, तो न पासपोर्ट मिलता है और न नौकरी।
कश्मीर मामलों के जानकार बिलाल बशीर ने कहा कि इस बदलाव के कई कारण है। कानून का राज बहाल हुआ है और इसलिए लोगों को पता है कि अगर कहीं कोई आतंकी या अलगाववादी पृष्ठभूमि, कनेक्शन सामने आया तो न नौकरी मिलेगी और न पासपोर्ट। इससे आपकी आर्थिक स्थिति,आपका करियर प्रभावित होगा। अब आतंकवाद के समर्थन के लिए ईनाम नहीं सजा है।इसके अलावा लोगों को एक बात समझ आ चुकी है कि अगर उन्हें तरक्की और खुशहाली चाहिए तो उन्हें आतंकवाद,अलगाववाद और आजादी के नारे से दूर रहना होगा,अपने बच्चों को इससे दूर रखना होगा। इसलिए वह अब अलगाववाद के बजाय राष्ट्रवाद क बात करते हैं।
लोग किसी भी सफलता के लिए भारत को श्रेय देते
आज कश्मीर में अगर आप देखेंगे तो कई युवाओं को, कई लोगों को इंटरनेट मीडिया पर तिरंगे के साथ अपनी तस्वीरें साझा करते हुए पाएंगे, पहले यहां पाकिस्तानी झंडे, आतंकियों के साथ या उनके पोस्टर के साथ या किसी अलगाववादी के साथ तस्वीरे ही नजर आती थी। अब यहां लोग किसी भी सफलता के लिए भारत को श्रेय देते हैं । आपको याद होगा कि करीब 12 वर्ष पहले एक स्थानीय युवक ने यूपीएससी की परीक्षा में टाप किया तो कई लोगों ने उसे कोसा,उसकी सफलता को हिंदुस्तान की चाल बताया था।
कश्मीर के एक वरिष्ठ पत्रकार ने अपना नाम न छापे जाने की शर्त पर कहा कि इस पूरे क्रम में एक बात ध्यान देने वाली है, पहले यहां कुछ लोग जब किसी के साथ अपनी दुश्मनी निकालना चाहते थे तो वह उसे ीाारतीय एजेंट ,सुरक्षाबलों का मुखबिर बताते थे। इसके बाद आतंकी उसे सजा दे देते थे या फिर उसे उसके अड़ोसी पड़ौसी और रिश्तेदार ही अलग थलग कर देते थे। उसके घर में रिश्ता तक नहीं करते थे। अब भी कई बार ऐसा देखने को मिलता है। इंटरनेट मीडिया पर कई बार आप देखेंगे कि कई लोग ऐसे सफेदपोश लोगों की आतंकी और अलगाववादी पृष्ठभूमि का सुबूतों के साथ खुलासा करते हैं जो खुद को पूरी तरह सदूध का धुला बताते हैं। खैर, अब कश्मीर में लोग आतंकवाद और अलगाववाद को गाली मानने लगे हैं और यही सबसे बड़ी बात है।




