नदीमर्ग नरसंहार केस को दोबारा खोलने का जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय ने दिया आदेश

जम्मू-कश्मीर। जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय ने एक दशक पहले बंद हो चुके नदीमर्ग नरसंहार केस को दोबारा खोलने का आदेश दिया है। हम आपको बता दें कि नदीमर्ग नरसंहार के दौरान 24 कश्मीरी पंडितों की आतंकवादियों ने बेरहमी से हत्या कर दी थी। जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति संजय धर ने 21 दिसम्बर 2011 के उस आदेश को वापस लेने का अनुरोध स्वीकार कर लिया है जिसमें आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी गई थी। मामले की सुनवाई अब 15 सितंबर, 2022 को होगी।

नदीमर्ग नरसंहार की बात करें तो आपने अक्सर सुना होगा कि 90 के दशक में कश्मीर में आतंकवाद बढ़ा तो कश्मीरी पंडितों की हत्याएं की गयीं, उन पर तमाम तरह के जुल्म किये गये जिससे वह पलायन कर गये। लेकिन बात सिर्फ 90 के दशक की ही नहीं थी। कश्मीरी पंडितों के नरसंहार साल 2003 में भी हुआ था। नदीमर्ग नरसंहार भारतीय इतिहास की सबसे खौफनाक घटनाओं में से एक है जिसमें लश्कर-ए-तैयबा के आतंकवादियों ने 24 हिंदू कश्मीरी पंडितों की हत्या कर दी थी। आपने यदि ‘द कश्मीर फाइल्स’ फिल्म देखी है तो उसमें अंत में एक साथ 24 कश्मीरी पंडितों को खड़ा करके गोली मारने का जो दृश्य है वही था नदीमर्ग नरसंहार। जम्मू-कश्मीर के पुलवामा जिले के नदीमर्ग गांव में जिस समय 24 चिताओं को मुखाग्नि दी जा रही थी तो वहां बस कश्मीरी पंडितों के रोने चीखने की आवाज ही सुनाई दे रही थी। चारों ओर सिर्फ कफन ही कफन नजर आ रहे थे। लोग कफन उठाकर अपनों को निहारते और दुखी मन से उनको विदाई देते नजर आ रहे थे। यह ऐसा दुखों का पहाड़ था जिसके आगे घाटी के पहाड़ भी छोटे नजर आ रहे थे। जब सामूहिक चिताओं पर आग की लपटें उठने लगीं और पीछे से कश्मीरी पंडित रोते हुए ‘ओम जय जगदीश’ आरती का उच्चारण कर रहे थे, वह दृश्य देखकर पूरी दुनिया के हिंदुओं का कलेजा छलनी हो गया था।

यह घटना कैसे हुई यह आपने ‘द कश्मीर फाइल्स’ फिल्म में विस्तार से देखा होगा। लेकिन आइये आपको कुछ चश्मदीदों की ओर से मीडिया को बताया गया वाकया बताते हैं। जम्मू-कश्मीर के शोपियाँ जिले में नदीमर्ग एक हिंदू बहुल गाँव था। गाँव की कुल आबादी मात्र 54 लोगों की थी। यह गांव अब पुलवामा में पड़ता है। 23 मार्च, 2003 की रात को इस गांव वालों का सबकुछ तबाह हो गया था। शाम ढलते ही जब अंधेरा होना शुरू हुआ तब सात पाकिस्तानी आतंकवादी नदीमर्ग गाँव में घुसे और सभी हिन्दुओं को उनका नाम से पुकार कर घर से बाहर बुलाया। बाहर बुलाकर महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया गया और सबके सामने उनके कपड़े फाड़े गये। बाद में सबको चिनार के पेड़ के नीचे इकट्ठा कर रात के 10 बजकर 30 मिनट पर सभी को गोली मार दी गयी। यहां गौर करने वाली बात यह है कि 23 मार्च को पाकिस्तान का राष्ट्रीय दिवस मनाया जाता है और उसी दिन इस घटना को अंजाम दिया गया था। जिन लोगों को गोली मारी गयी उनमें 70 साल की बुजुर्ग महिला, 2 साल का मासूम बच्चा और एक दिव्यांग तक शामिल था। 11 महिलाओं, 11 पुरुषों और 2 बच्चों पर आतंकवादियों ने बेहद नजदीक से गोली चलाई थी ताकि मरने वाले अपनी मौत को नजदीक से देख सकें। इसके बाद आतंकवादियों ने कश्मीरी पंडितों के घरों को लूटा था और महिलाओं के गहने भी अपने साथ ले गये थे।

इस पूरे प्रकरण में तत्कालीन राज्य सरकार की भूमिका संदेह के घेरे में रही थी क्योंकि बताया गया था कि नरसंहार से पहले उस इलाके की सुरक्षा में लगी पुलिस को हटा लिया गया था। 30 सुरक्षाकर्मियों की जगह मात्र 5 ही सुरक्षाकर्मी ड्यूटी पर थे और उन्होंने भी नरसंहार रोकने के लिए कोई हस्तक्षेप नहीं किया था। जब इस घटना पर बड़ा बवाल हुआ तब नरसंहार में शामिल एक आतंकवादी जिया मुस्तफा को गिरफ्तार किया गया था। पाकिस्तान के रावलकोट का रहने वाला यह आतंकवादी लश्कर-ए-तय्यबा का एरिया कमांडर था। उसने जाँच के दौरान बताया था कि लश्कर के अबू उमैर ने उसे ऐसा करने के लिए कहा था। इस घटना के बाद कश्मीरी पंडित एकदम टूट-से गये थे और उन्हें इस बात का यकीन हो गया था कि वह अब इस राज्य में सुरक्षित नहीं हैं इसलिए पलायन कर गये। यही नहीं, एक तरफ हिन्दुओं का नरसंहार हुआ तो दूसरी ओर उन्हें मानसिक प्रताड़ना भी झेलने को मिली। उनके घर सस्ते दामों में स्थानीय मुस्लिमों को बेच दिए गए। इसके अलावा बीते दशकों में उन्हें सरकार और अदालत से भी कोई न्याय नहीं मिला क्योंकि कहीं कोई सुनवाई ही नहीं हुई और कोई उनकी मदद के लिए आगे भी नहीं आया। लेकिन अब कश्मीरी पंडितों को न्याय मिलने की शुरुआत हो चुकी है। उनके हत्यारे ठोके जा रहे हैं और अब नदीमर्ग हत्याकांड का मामला दोबारा खुलने से उम्मीद जगी है कि उन्हें न्याय मिलेगा।

इस बीच, भाजपा ने अदालत के इस फैसले का स्वागत किया है। पार्टी के आईटी प्रकोष्ठ के प्रमुख अमित मालवीय ने कहा है कि कश्मीर को बचाना एक सभ्यतागत लड़ाई है और इसे राज्य और नागरिक समाज की पूरी ताकत से लड़ा जाना चाहिए। उन्होंने ट्वीट करके कहा कि दशकों से “धर्मनिरपेक्षता” के नाम पर कालीन के नीचे धकेले गए मामलों पर फिर से विचार किया जा रहा है। इससे पहले कोई भी सरकार न्याय सुनिश्चित करने के लिए अधिक प्रतिबद्ध नहीं रही है। वहीं जम्मू-कश्मीर के पूर्व उपमुख्यमंत्री कविंद्र गुप्ता ने भी अदालत के फैसले का स्वागत किया है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button