आईआरएस अधिकारी निशा उरांव ने हिंदू संस्कृति को ‘विदेशी’ बताने वाले विमर्श पर जताई आपत्ति, धर्म-संरक्षण की अपील
आईआरएस निशा उरांव ने एक बार फिर देश में धर्मांतरण की बढ़ती घटनाओं पर चिंता व्यक्त करता है कि अब चुप रहने का समय नहीं रह गया है, क्योंकि हम आखिरी पीढ़ी बचे हैं जिनको पूर्वजों की परंपरा याद है। अगर आज चुप रह गए तो आदिवासियों के अस्तित्व पर ही संकट उत्पन्न हो जाएगा।

रांची,एजेंसी। भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) की अधिकारी निशा उरांव ने हिंदू संस्कृति और हिंदुत्व को ‘विदेशी’ बताने वाले विचारों पर आपत्ति जताते हुए इसे देश की सांस्कृतिक पहचान और संप्रभुता से जुड़ा मुद्दा बताया है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ तत्व विभिन्न आस्थाओं के बीच अविश्वास पैदा करने का प्रयास करते हैं। उरांव ने भारतीय परंपराओं के संरक्षण और सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की अपील भी की है।
निशा उरांव ने अपनी टिप्पणी में कहा कि भारत में हिंदू संस्कृति और हिंदुत्व को विदेशी बताने वाला विमर्श देश की सांस्कृतिक जड़ों पर सवाल खड़े करता है। उन्होंने संबंधित विचारधारा की आलोचना करते हुए कहा कि इस तरह की सोच समाज में धार्मिक आस्थाओं के बीच दूरी पैदा कर सकती है। उन्होंने इसे धर्मनिरपेक्षता की भावना के विपरीत बताते हुए देश की संप्रभुता से जुड़ी चिंता के रूप में प्रस्तुत किया।
झारखंड में धार्मिक परंपराओं के संरक्षण और धर्मांतरण के मुद्दे पर भी उन्होंने अपनी बात रखी। उरांव के अनुसार, लोहरदगा जिले के हाटी गांव से धर्मांतरण पर प्रतिबंध लगाने की मांग से जुड़ी मुहिम शुरू हुई थी, जो अब राज्य के अन्य हिस्सों तक फैल रही है। उन्होंने कहा कि वर्तमान पीढ़ी की जिम्मेदारी है कि वह अपने पूर्वजों की परंपराओं, रीति-रिवाजों और पूजा-पद्धतियों को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाए।
उरांव ने बताया कि पंचायती राज निदेशक के रूप में कार्य करते समय उन्होंने धर्म-संरक्षण के उद्देश्य से झारखंड पेसा नियमावली में एक विशेष प्रावधान शामिल किया था। उनके दावे के अनुसार, पंचायतों के अनुसूचित क्षेत्रों में ग्रामसभा की भूमिका और अधिकारों से जुड़े प्रावधान के तहत धर्मांतरण के विरोध में जागरूकता संबंधी बोर्ड लगाए जा रहे हैं। उन्होंने इस व्यवस्था को पेसा अधिनियम और झारखंड पेसा नियमावली से जुड़ा बताया।
उन्होंने समाज के विभिन्न धर्मों को मानने वाले लोगों और राष्ट्रहित में विश्वास रखने वाले नागरिकों से सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण में सहयोग की अपील की। उनका कहना है कि स्थानीय समुदायों की धार्मिक पहचान, परंपराओं और रीति-रिवाजों को सुरक्षित रखना आवश्यक है।
सोशल मीडिया मंच एक्स पर भी निशा उरांव ने परंपराओं के संरक्षण को लेकर संदेश साझा किया। उन्होंने युवा पीढ़ी से अपने पूर्वजों की विरासत को समझने और उसके प्रति जागरूक रहने का आह्वान किया। अपनी पोस्ट में उन्होंने महादेव, धर्मेश और सिंगबोंगा जैसी पारंपरिक आस्थाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि प्राचीन पूजा-पद्धतियों और सांस्कृतिक मान्यताओं से जुड़े लोगों को अपनी परंपराओं के लिए आवाज उठानी चाहिए।
निशा उरांव की टिप्पणियों के बाद धार्मिक पहचान, सांस्कृतिक विरासत और धर्मांतरण से जुड़े मुद्दे फिर चर्चा में आ गए हैं। हालांकि, पेसा अधिनियम और झारखंड पेसा नियमावली के प्रावधानों के तहत ग्रामसभा के अधिकारों तथा बोर्ड लगाने की वैधानिक सीमा को लेकर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले संबंधित कानूनी प्रावधानों और आधिकारिक दस्तावेजों की पुष्टि आवश्यक है।




