सीजेपी के विरोध के बीच धर्मेंद्र प्रधान में ऐसा क्या, जिन्हें हटाने में हिचक रही है मोदी सरकार
साल 2021 के जुलाई महीने की शुरुआत में देश के शिक्षा मंत्री बने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को लेकर दिल्ली की सड़कें 'अशांत' हैं। सीजेपी प्रोटेस्ट और दिल्ली पुलिस के बल प्रयोग की गूंज संसद तक है, लेकिन सरकार ने अभी तक ऐसा कोई संकेत नहीं दिया है कि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा भी हो सकता है, जानिए आखिर क्या हैं इसके पीछे के कारण?

नई दिल्ली/एजेंसी। नीट परीक्षा पेपर लीक के मुद्दे को लेकर जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) का विरोध प्रदर्शन जारी है, जिसमें केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की प्रमुख मांग उठाई जा रही है। हालांकि संसद मार्च और लगातार प्रदर्शनों के बावजूद फिलहाल ऐसे कोई संकेत नहीं मिले हैं कि सरकार इस मांग को स्वीकार करने के मूड में है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार में आंदोलनों या विपक्ष के दबाव में मंत्रियों के इस्तीफे की परंपरा बहुत कम देखने को मिली है। गुजरात से लेकर केंद्र की सत्ता तक के अपने कार्यकाल में प्रधानमंत्री मोदी ने अधिकांश फैसले अपने राजनीतिक और प्रशासनिक आकलन के आधार पर ही लिए हैं। ऐसे में सीजेपी के विरोध के बावजूद सरकार की ओर से किसी प्रकार की जल्दबाजी या चिंता स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं दे रही है।
धर्मेंद्र प्रधान मोदी सरकार के उन वरिष्ठ मंत्रियों में शामिल हैं, जो 2014 से लगातार तीनों कार्यकाल में कैबिनेट का हिस्सा रहे हैं। उनके साथ राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी, निर्मला सीतारमण, पीयूष गोयल, राव इंद्रजीत सिंह और डॉ. जितेंद्र सिंह जैसे नेता भी लंबे समय से सरकार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभा रहे हैं। वहीं गृह मंत्री अमित शाह और विदेश मंत्री एस. जयशंकर बाद के वर्षों में सरकार से जुड़े।
धर्मेंद्र प्रधान का मंत्री के रूप में लंबा अनुभव रहा है। वे 2014 से 2021 तक पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री, 2017 से 2024 तक कौशल विकास और उद्यमिता मंत्री, 2019 से 2021 तक इस्पात मंत्री और जुलाई 2021 से अब तक शिक्षा मंत्री के रूप में कार्यरत हैं। शिक्षा मंत्री के रूप में उनका कार्यकाल अब पांच वर्ष से अधिक का हो चुका है, जो मोदी सरकार में अब तक का सबसे लंबा कार्यकाल है। यदि वे कुछ समय और इस पद पर बने रहते हैं तो पूर्व शिक्षा मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी का रिकॉर्ड भी पीछे छूट सकता है, जिन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में लगभग छह वर्ष से अधिक समय तक यह जिम्मेदारी संभाली थी। इसके बाद भी शिक्षा मंत्रालय के इतिहास में मौलाना अबुल कलाम आजाद, अर्जुन सिंह और के.एल. श्रीमाली जैसे नेताओं के लंबे कार्यकाल दर्ज हैं।
सीजेपी के आंदोलन के बावजूद सरकार पर तत्काल दबाव न बनने के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं। पहला, आंदोलन की विश्वसनीयता को लेकर सवाल उठ रहे हैं और इसे संगठित राजनीतिक दबाव के रूप में नहीं देखा जा रहा। दूसरा, वर्तमान समय में कोई बड़ा चुनाव नजदीक नहीं है, जिससे राजनीतिक जोखिम सीमित माना जा रहा है। तीसरा, मोदी सरकार में मंत्रियों के कार्यों की समीक्षा प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) के स्तर पर लगातार होती रहती है, और यदि किसी मंत्री का प्रदर्शन संतोषजनक न होता तो लंबे समय तक पद पर बने रहना मुश्किल होता।
इसके अलावा, यह भी माना जा रहा है कि आंदोलनकारियों की ओर से केवल इस्तीफे की मांग की जा रही है, लेकिन वैकल्पिक समाधान या स्पष्ट रोडमैप सामने नहीं रखा गया है। हालांकि 20 जुलाई को पहली बार सीजेपी ने अपनी मांगों को लिखित रूप में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा को सौंपा है। उल्लेखनीय है कि जिस महीने जुलाई में धर्मेंद्र प्रधान ने शिक्षा मंत्री का पद संभाला था, उसी महीने उनके इस्तीफे की मांग को लेकर राजधानी में विरोध प्रदर्शन तेज है। इस मुद्दे के चलते मानसून सत्र के दौरान संसद की कार्यवाही भी प्रभावित हो रही है और विपक्ष सरकार पर लगातार दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है।




