दलाई लामा के भाई का निधन, तिब्बत की आजादी के लिए लड़ाई में निभाई अहम भूमिका

Dalai Lama's brother passed away, he played an important role in the fight for Tibet's independence

कोलकाता/एजेंसी। पश्चिम बंगाल में दलाई लामा के बड़े भाई, ग्यालो थोंडुप का निधन हो गया। वह कलिमपोंग में रहते थे। उन्होंने 97 साल की उम्र में अपने घर पर अंतिम सांस ली। परिवार के एक सदस्य ने बताया, ‘वह (थोंडुप) बुढ़ापे के कारण कई बीमारियों से ग्रसित थे। बीते दो हफ्ते से वे ज्यादा बीमार थे। डॉक्टर्स ने उन्हें घर पर ही रखने की सलाह दी थी।थोंडुप एक बड़े तिब्बती नेता थे। उन्होंने अपने भाई दलाई लामा से पहले ही चीन छोड़ दिया था। कलिमपोंग में उनका नूडल्स का कारोबार भी काफी फलता-फूलता था। परिवार के एक अन्य सूत्र ने बताया कि थोंडुप ने अपना जीवन तिब्बत के लिए समर्पित कर दिया था।
सूत्र ने कहा, ‘वह ज्यादातर अपने भाई, 14वें दलाई लामा की तरफ से बोलते थे और तिब्बत की आजादी के लिए दुनिया के नेताओं से मिलते थे।’ थोंडुप 1952 में तिब्बत से चुपके से निकल गए थे। दलाई लामा, जो अब 89 वर्ष के हैं, 1959 में तिब्बत से भागे थे। थोंडुप की बहन और बहनोई हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला से आ गए हैं। धर्मशाला तिब्बती सरकार-निर्वासन का केंद्र है। वहां के वरिष्ठ अधिकारियों के सोमवार को आने की उम्मीद है। थोंडुप का अंतिम संस्कार मंगलवार को कलिमपोंग में होगा।
थोंडुप का जन्म 1928 में चीन के टाक्टसर में हुआ था। 1939 में, वह अपने परिवार के साथ तिब्बत के ल्हासा चले गए। 14 साल की उम्र में, वह चीन के नानजिंग में चीनी इतिहास पढ़ने गए। वहां उनकी मुलाकात च्यांग काई-शेक सहित कई प्रभावशाली नेताओं से हुई। 1948 में, उन्होंने एक कुओमिन्तांग जनरल की बेटी झू डैन से शादी की। चीन में तनाव बढ़ने पर, उन्होंने 1949 में नानजिंग छोड़ दिया।
2019 में जब उनकी नूडल फैक्ट्री में आग लग गई थी, तब थोंडुप ने इस रिपोर्टर के साथ अपने निर्वासन जीवन के अनुभव साझा किए थे। उन्होंने बताया कि 1952 में तिब्बत से भागने के बाद, वह दार्जिलिंग पहुंचे, लेकिन उन्हें काम ढूंढने में बहुत मुश्किल हुई। उस समय, सिक्किम के एक अधिकारी ने उन्हें व्यवसाय शुरू करने का सुझाव दिया, लेकिन उन्हें कोई अनुभव नहीं था। भारत सरकार ने उन्हें आयात लाइसेंस दिया और कलिमपोंग में उनके दोस्तों ने उनकी मदद की।
बाद में उन्होंने नूडल फैक्ट्री शुरू की। थोंडुप ने उस समय कहा था, ‘मैंने और मेरी पत्नी ने इस पर चर्चा की, इसलिए मैंने कलिमपोंग में जमीन की तलाश की। कीमतें बहुत ज्यादा थीं, लेकिन मैं भाग्यशाली था कि मुझे 7,200 रुपये में एक प्लॉट मिल गया।’ 1966-67 तक, उन्होंने कलिमपोंग में अपना घर, ‘टैग्टसर हाउस’ नाम से, और अपना नूडल व्यवसाय स्थापित कर लिया, जिसने उनके परिवार का पांच दशकों से अधिक समय तक पालन-पोषण किया। थोंडुप ने बाद में अपने जीवन के अनुभवों को अपने संस्मरण, ‘द नूडल मेकर ऑफ कलिमपोंग’ में विस्तार से लिखा। यह किताब उनके जीवन की कहानी बयां करती है।

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