राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने ब्रह्मकुमारीज शांतिवन में शिखर सम्मेलन का किया शुभारंभ

केवल भौतिकता अपनाना विनाशकारी है,इंसान कर्म से महान बनता है : राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू

आबूरोड/राजस्थान। राजस्थान के आबूरोड स्थित ब्रह्मकुमारीज संस्थान के शांतिवन शुक्रवार 3 अक्टूबर से वैश्विक शिखर सम्मेलन का आगाज हुआ है। इस सम्मेलन का उद्घाटन राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने किया। राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में विश्व शांति, अध्यात्म, ग्लोबल वार्मिंग, स्वच्छ भारत मिशन और जल जीवन मिशन और पर्यावरण पर अपनी बात कही। उन्होंने कहा कि जब हम शांत होते हैं, तभी दूसरों के प्रति सहानुभूति और प्रेम का भाव रख सकते हैं। इस सम्मेलन में राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े भी मौजूद रहे। सम्मेलन से पहले राष्ट्रपति ने संस्थान के मान सरोवर परिसर में पेड़ लगाया और देशवासियों से एक पेड़ मां के नाम लगाने का किया आहृान किया।
आध्यात्मिकता द्वारा स्वच्छ एवं स्वस्थ समाज विषय पर आयोजित सम्मेलन में संबोधित करते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि आज विश्व के अनेकों हिस्सों में अशांति का वातावरण व्याप्त है। मानवीय मूल्यों का ह्रास हो रहा है। ऐसे समय में शांति और एकता की महत्ता और अधिक बढ़ रही है। शांति केवल बाहर ही नहीं, बल्कि हमारे मन की गहराई में स्थित होती है। जब हम शांत होते हैं, तभी हम दूसरों के प्रति सहानुभूति और प्रेम का भाव रख सकते हैं। इसलिए मन, वचन और कर्म सबको स्वच्छ रखना होगा। आध्यात्मिक मूल्यों का तिरस्कार करके केवल भौतिक प्रवृत्ति का मार्ग अपनाना अंतत: विनाशकारी सिद्ध होता है।
राष्ट्रपति मुर्मू ने कहा कि आध्यात्मिकता का मतलब केवल धार्मिक होना या सांसारिक कार्यों का त्याग करना नहीं है। आध्यात्मिकता का अर्थ है अपने भीतर की शक्ति को पहचान कर अपने आचरण और विचारों में शुद्धता लाना। कर्मों का त्याग करके नहीं कर्मों का सुधार कर ही बेहतर इंसान बन सकता है। विचारों और कार्यों में शुद्धता जीवन के हर क्षेत्र में संतुलन और शांति लाने का मार्ग है। स्वच्छ और स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए भी यह आवश्यक है। स्वच्छ और स्वस्थ शरीर में ही पवित्र अंत:करण का निवास होता है। उन्होंने कहा कि स्वच्छता केवल बाहरी वातावरण में नहीं बल्कि हमारे विचारों और कार्यों में भी होना चाहिए। हम परमात्मा की संतान हैं। परमात्मा की तरह हम भी विचित्र हैं। हम स्वच्छ और शुद्ध थे लेकिन यहां पर आकर हमने अपने आप को दाग लगाया। काम, क्रोध, लोभ, मोह, हिंसा से हमारी आत्मा पर विकारों की मेल चढ़ गई है, जिसे शुद्ध बनाए जाने की जरूरत है। जब आत्मा शुद्ध होगी तो सब शुद्ध हो जाएगा। अगर हम मानसिक और आत्मिक रूप से स्वच्छ नहीं हैं तो हमारी स्वच्छता निष्फल रहेगी।

राष्ट्रपति मुर्मु ने कहा कि भारत प्राचीन समय से ही आध्यात्मिक क्षेत्र में विश्व समुदाय का मार्गदर्शन करता रहा है। मेरी कामना है कि ब्रह्माकुमारीज़ जैसे संस्थान भारत की इस पहचान को और मजबूत बनाने का काम करें। भौतिकता हमें क्षणिक सुख देती है, यह हम सब जानते हैं। जिसे हम असली सुख समझकर उसके मोह में पड़ जाते हैं। यही मोह हमारे दुख व असंतुष्टी का कारण बन जाता है। दूसरी ओर अध्यात्म हमें अपने आप को जानने का, अपने अंतर्मन को पहचानने का अवसर देता है। अध्यात्म से जुड़ाव हमें समाज और विश्व को देखने का एक अलग सकारात्मक दृष्टिकोण प्रदान करता है। यह दृष्टिकोण हमें प्राणियों के प्रति दया और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता का भाव उत्पन्न करता है। आध्यात्मिकता न केवल व्यक्तिगत विकास का साधन है, बल्कि समाज में सकारात्मकता लाने का मार्ग भी है।
राष्ट्रपति ने देश के कई महत्वपूर्ण विषयों पर भी अपनी बात रखी। ग्लोबल वार्मिंग विषय पर उन्होंने कहा कि वर्तमान में पूरा विश्व ग्लोबल वार्मिंग और पर्यावरण की समस्याओं से जूझ रहा है। इसे बचाने के प्रयास करना चाहिए। मनुष्यों को यह समझना चाहिए कि वह इस धरती का स्वामी नहीं है। बल्कि पृथ्वी के संरक्षण के लिए जिम्मेदार है। हम ट्रस्टी हैं, हम ऑनर नहीं हैं। इसलिए ट्रस्टी के रूप में इस धरती, इस प्लेनेट को हम लोगों को उसी दिशा में संभालना है, आगे बढ़ाना है। हमें विवेक से इस गृह की रक्षा करनी है। स्वच्छ भारत और जन जीवन मिशन के विषय पर उन्होंने कहा कि भारत सरकार देशवासियों के स्वच्छ और स्वस्थ जीवन के लिए अनेक प्रयास कर रही है। स्वच्छ भारत मिशन के हाल ही में दस वर्ष पूरे हुए हैं। इस मिशन ने समाज में स्वच्छता के प्रति जागरूकता बढ़ाई है। जल जीवन मिशन के अंतर्गत हर घर में स्वच्छ जल मुहैया कराने का संकल्प लिया गया है। 78 फीसदी से अधिक ग्रामीण घरों में नल से स्वच्छ जल पहुंचाया जाता है। यह बहुत ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि स्वच्छ जल न केवल स्वच्छता बल्कि संपूर्ण शरीर के लिए आवश्यक है।

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