‘बेहिसाब साइबर क्राइम, पर दिल्ली पुलिस आईटी एक्ट में दर्ज नहीं करती केस’, दिल्ली हाई कोर्ट ने मांगा जवाब

नई दिल्ली। दिल्ली पुलिस साइबर क्राइम से जुड़े मामलों में इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (आईटी) एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज करने से कतराती क्यों है? यह सवाल दिल्ली हाई कोर्ट में दायर एक जनहित याचिका में उठाया गया। इस पर केंद्र, दिल्ली पुलिस और दिल्ली सरकार को हलफनामा दायर करने का निर्देश मिला है। चीफ जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद की बेंच ने अनन्या कुमार की याचिका पर अगली सुनवाई के लिए 15 मई की तारीख तय की है। याचिकाकर्ता साइबर लॉ में पीएचडी कर रही हैं। उनकी मांग है कि दिल्ली पुलिस को साइबर क्राइम के मामलों में आईटी एक्ट के प्रावधानों में केस दर्ज करने का निर्देश दिया जाए और सरकारें एडजुडिकेटिंग ऑफिसर (एओ) की नियुक्ति के लिए अलग से इन्फ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध कराएं।
याचिका के मुताबिक, संसद ने साइबर क्राइम पीड़ितों को संरक्षण देने के लिए आईटी एक्ट-2000 बनाया था। लेकिन, प्रतिवादी इस कानून का सही मायने में इस्तेमाल नहीं करते। इस वजह से लोग वक्त पर आपराधिक और दीवानी उपाय करने में असमर्थ हैं। ऐसे में दिल्ली में स्पेशल साइबर पुलिस स्टेशन बनाने या चलाने का भी कोई फायदा नहीं है। जब कभी साइबर क्राइम से पीड़ित कोई व्यक्ति कानूनी कार्रवाई के लिए पुलिस के पास जाता है, तो वह रूटीन प्रक्रिया के मुताबिक आईपीसी में केस दर्ज करती है। यह सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘शरत बाबू दिगुमारती बनाम दिल्ली सरकार’ मामले में दी गई व्यवस्था के खिलाफ है।

याचिकाकर्ता ने नैशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की साल 2020-21 की रिपोर्ट कोर्ट के सामने रखी। बेंगलुरु, लखनऊ, गाजियाबाद के आंकड़ों की तुलना दिल्ली से की, जहां एक लाख की आबादी में सिर्फ एक ऐसा केस दर्ज किया गया। आरटीआई से मिली जानकारी का हवाला देते हुए याचिकाकर्ता ने कहा कि खबरें राष्ट्रीय राजधानी में 2020-21 के बीच साइबर क्राइम में 100 फीसदी की बढ़ोतरी का प्रमाण दे रही हैं और स्पेशल थानों के आंकड़े ‘शून्य’ हैं। याचिकाकर्ता ने दूसरी शिकायत एओ के संबंध में की। उन्होंने कहा कि आईटी एक्ट के सेक्शन-46 के अंतर्गत एक एओ होना चाहिए जो तय करे कि क्या आईटी एक्ट के तहत कानूनी प्रावधानों, नियमों, आदेशों के विरुद्ध काम हुआ और केंद्र सरकार के मानकों के मुताबिक छानबीन करे। उसके पास सिविल कोर्ट के बराबर शक्तियां हों, पर दिल्ली में एओ को लेकर जानकारी नदारद होने से ऐसा नहीं लगता कि इस कानून का यहां पालन हो रहा है।

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